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शंकराचार्य एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने के लिए गंगा के तट पर जा रहे थे. रास्ते में एक स्त्री अपने पति का शव रखकर विलाप कर रही थी.

शंकराचार्य ने उससे शव को मार्ग से हटाने के लिए कहा तो उस स्त्री ने कहा कि शव को क्यों नहीं कह देते कि वह हट जाए.

शंकराचार्य ने कहा- शव में हटने की शक्ति नहीं है.

स्त्री ने कहा- आपके मतानुसार तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगतकर्ता है तो यह शव शक्ति के बिना क्यों नहीं हटता? इतना कहकर वह स्त्री वहां से अंतर्धान हो गई.

इससे शंकराचार्य को शक्ति के महत्व का ज्ञान हुआ. तब उन्होंने श्री की उपासना प्रारंभ की और श्रीविद्या के प्रवर्तक के रूप में जाने जाने लगे.

शंकराचार्य जी ने कनकधारा स्तोत्र की रचना क्यों और कैसे की इसकी एक बड़ी रोचक घटना है.

पांच वर्ष की उम्र थी शंकर की. भिक्षा मांगने के लिए उन्होंने एक दरवाजे पर आवाज लगाई. उस घर में एक गरीब स्त्री रहती थी.

वह संकोच के साथ बाहर आई और बोली- मैं अत्यंत निर्धन हूं. मैंने आज भोजन भी नहीं किया है.

मेरे पास देने के लिए एक आंवले के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है. मुझे क्षमा करें. स्त्री ने वह आंवला उनके भिक्षापात्र में डाल दिया.

यह सुनकर बालक शंकर का हृदय द्रवित हो गया. उन्होंने उसके दरवाजे पर ही खडे होकर माता लक्ष्मी की आराधना शुरू की. स्तुति के लिए उन्होंने जो श्लोक कहे वही कनकधारा स्तोत्र है.

मां लक्ष्मी प्रसन्न हुईं और उस स्त्री के घर कनकवर्षा हुई. इस तरह उसकी दरिद्रता दूर हो गई.

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