[sc:fb]

ऐसा जानकर आचार्य शंकर के मन में संन्यास लेकर लोक-सेवा की भावना प्रबल हो गई थी. संन्यास के लिए उन्होंने माँ से हठ किया पर इकलौते पुत्र को माता कैसे जाने देतीं. उन्होंने साफ मना कर दिया.

शंकर को एक उपाय सूझा. कुछ समय बाद वह अपनी माता के साथ किसी पर्व के अवसर पर नदी स्नान को गए तो तैरते-तैरते माता को पुकारा- माता मुझे मगरमच्छ ने पकड़ लिया है और नीचे खींच रहा है.

माता ने चीखना-चिल्लाना आरंभ कर दिया. बालक ने कहा- माता एक ही रास्ता है. तुम मुझे शिवजी के लिए अर्पण कर दो, वही मेरी प्राण रक्षा करेंगे.

माता ने कहा- ऐसा है तो मैं तुझे शिवजी की सेवा के लिए समर्पित करती हूं. वही इस मगरमच्छ तुम्हारी रक्षा करें. शंकर तैरकर बाहर आ गए तो माता के जान में जान आई.

शंकर ने तत्काल याद दिलाया- माता आप मुझे शिवजी के लिए समर्पित कर चुकी हैं. अब मैं उनके लिए अर्पित हूं. मुझे शिवकार्य से मत रोकना, मुझे संन्यास ग्रहणकर धर्म के अन्वेषण के लिए जाने की आज्ञा दो.

माता बहुत रोईं-कलपीं. शंकर नर्मदा की ओर निकल पड़े. आदि शेषावतार माने जाने वाले गोविन्द भगवत्पाद के आश्रम पहुंचे. गोविंदपाद भी जैसे उनकी ही प्रतीक्षा में जीवन गुजार रहे थे.

शंकर ने उनसे दीक्षा ग्रहण की. दो वर्ष बाद गुरू ने आदेश किया- तुम अब एक पूर्ण संन्यासी हो. राजयोग, हठयोग और ज्ञान योग की शास्त्र शिक्षा पूरी कर चुके हो. अब तुम व्यवहारिक शिक्षा के लिए काशी जाओ.

संन्यास लेने से शंकर की पूर्णायु आठ वर्ष से सोलह वर्ष हो गई.

वयोवृद्ध गुरुभाइयों के साथ एक तेजस्वी शंकर काशी पहुंचे तो वहां हलचल मच गई. विद्वान उनके दर्शन को आने लगे. उनकी आयु ही थोड़ी थी पर उनके ज्ञान की बराबरी करने वाला कोई न था.

शंकर को उनके ज्ञान को देखते हुए अब आचार्य मान लिया गया था. शंकर से वह अब शंकराचार्य के रूप में काशी में विख्यात हो गए थे.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here