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कुछ प्रकांड ज्योतिषी भी आए यह जानने कि आखिर किन ग्रहों का प्रभाव है कि नवजात शिशु के चेहरे से कांति निकल रही है. एक प्रकांड ज्योतिषी ने बालक के दर्शन किए पर उसके बाद उनका चेहरा उदास हो गया.
शिवगुरू ने कारण पूछा तो वह टालने लगे. ज्योतिषी की ब़ड़ी प्रसिद्धि थी.
शिवगुरू ने हठ कर दिया तो उन्होंने बताया कि बालक अल्पायु है. इसकी आयु केवल आठ वर्ष है. यदि यह तप करे तो इसे आठ साल की आयु और प्राप्त हो सकती है.
शिवगुरू को स्वप्न का स्मरण हो आया. बालक शंकर को भी पता था कि उनको बहुत कम उम्र में बहुत से कार्य पूरे करके मृत्यु लोक से विदा लेना है. एक वर्ष की उम्र में ही इनमें देवत्व का गुण आ गया. दो वर्ष की उम्र में माता से पुराणों का ज्ञान प्राप्त कर लिए.
पिता की अकाल मृत्यु होने से शैशवावस्था में ही शंकर के सिर से पिता का साया उठ गया. सारा बोझ शंकर की माता के कंधों पर आ पड़ा. पाँच वर्ष की अवस्था में इनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाकर वेदों का अध्ययन करने के लिए गुरुकुल भेज दिया गया.
ये प्रारंभ से ही प्रतिभा संपन्न थे, अत: इनकी प्रतिभा से इनके गुरु भी बेहद चकित थे. अप्रतिम प्रतिभा संपन्न बालक शंकर ने मात्र दो वर्ष में वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए.
तत्पश्चात गुरु से सम्मानित होकर घर लौट आए और माता की सेवा करने लगे.
उनकी मातृ शक्ति इतनी विलक्षण थी कि उनकी प्रार्थना पर आलवाई (पूर्णा) नदी, जो उनके गाँव से बहुत दूर बहती थी, उसने अपनी दिशा बदल दी और इनके गांव के समीप बहने लगी जिससे उनकी माता को नदी स्नान में सुविधा हो गई.
कुछ समय बाद इनकी माता ने इनके विवाह की सोची पर आचार्य शंकर गृहस्थी के झंझट से दूर रहना चाहते थे. एक ज्योतिषी ने जन्म-पत्री देखकर बताया भी था कि अल्पायु में इनकी मृत्यु का योग है.
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