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युवक ने फिर कहना शुरू किया- जब मैं पढ़ाई करता था तब लोग मेरे पास परामर्श के लिए आते थे. अपने विवेक से उत्तर देकर मैं उन्हें संतुष्ट करता था. अब मेरे जैसे बुद्धिमान के लिए इन सत्संगों में सीखने को क्या रह गया है?

कबीरदासजी ने कहा कुछ नहीं बस चुपचाप उठे. वहां रखी एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर जोरदार मार दी. युवक को लगा कि शायद महाराजजी ने मौन व्रत लिया है. वह चला गया.
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