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आखिरकार महर्षि दुर्वासा मुद्गल की अंतिम परीक्षा लेने के लिए छह हजार शिष्यों के साथ उनके आश्रम में पहुंचे. मुद्गल जी ने सभी का सत्कार किया और उन्हें आदर सहित बिठाया. भोजन भी कराया.
दुर्वासा प्रसन्न होकर बोले, महर्षि इस संसार में आपके समान अतिथि सेवा करने वाला, अन्न दानी कोई नहीं है. भूख मनुष्य के धर्म, ज्ञान व धैर्य को नष्ट कर देती है, किंतु आप पर उसका प्रभाव नहीं पड़ा. अत: आप शीघ्र ही स्वर्ग जाएंगे.
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