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खांडव वनदाह के समय तक्ष का पुत्र अश्वसेन छोटा था. उसकी माता को उसके वंश के समाप्त होने की चिंता हुई. उसने अपनी जान देकर किसी प्रकार अपने पुत्र अश्वसेन को बचा लिया. यह कथा भी बहुत करूण है.

अश्वसेन के अतिरिक्त खांडववन में मायासुर तथा चार शार्र्ग नामक पक्षी बच गए थे. इस वनदाह से अग्नि देव तृप्त हो गये तथा उनका रोग भी नष्ट हो गया.

मयासुर को अर्जुन ने पकड़ लिया. मयासुर ने अर्जुन से प्रार्थना की कि उसके प्राण न ले इसके बदले वह उनके बड़े काम आएगा.

मयासुर असुरों का विश्वकर्मा था. उसने अर्जुन और श्रीकृष्ण को वचन दिया कि वह पांडवों के लिए हस्तिनापुर से भी ज्यादा भव्य नगर बनाकर देगा. अर्जुन ने उसे छोड़ दिया. उसी मयासुर ने इंद्रप्रस्थ का मायामहल बनाया जिसमें दुर्योधन उलझ गया था.

खांडववन में अपनी माता को गंवाने वाला अश्वसेन ने अर्जुन के वध के लिए किस प्रकार कई जन्म लिए और कर्ण की सहायता को आया था नीतिवान कर्ण ने उसकी सहायता लेने से मना कर दिया था. यह कथा भी बड़ी रोचक है इसे फिर सुनाउंगा.

खांडवदाह के बाद इन्द्र मरुद्गण आदि देवताओं के साथ प्रकट हुए तथा अर्जुन से वर मांगने के लिए कहा. अर्जुन ने सब प्रकार के दिव्यास्त्रों की कामना प्रकट की. इन्द्र ने कहा कि समस्त दिव्यास्त्रों पर शिवजी का अधिकार है. उन्हें प्रसन्न कर लेने पर ही दिव्यास्त्र प्राप्त होंगे.
(महाभारत की कथा)

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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