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ब्रह्माजी अग्निदेव की पीड़ा से स्वयं भी दुखित हुए.
ब्रह्माजी ने कहा- हे अग्नि तुम खांडव वन को जलाकर उसके जीवों का भक्षण कर लो तो इससे तुम्हारी अरूचि खत्म हो जाएगी.
इसलिए ब्रह्माजी के आदेश पर अग्रिदेव ने खांडव वन को सात बार वन जलाने की कोशिश की लेकिन इन्द्र ने उन्हें सफल ही नहीं होने दिया.
इंद्र ऐसा इसलिए नहीं करने देना चाहते थे क्योंकि उस वन में इंद्र के मित्र तक्षक के कुल का वास था.
इसलिए जैसे ही अग्नि उसे जलाने का प्रयास करते इंद्र के भेजे भयंकर मेघ मूसलाधार बारिश करने लगते और अग्निदेव को हारकर जाना पड़ता. अग्निदेव ने जाकर सारी बात ब्रह्माजी को बताई.
ब्रह्माजी ने अग्नि को सुझाव दिया कि तुम श्रीकृष्ण और अर्जुन की सहायता लो. उन्हें किसी प्रकार से इसके लिए तैयार कर लो. इसमें परस्पर लाभ है. उनकी सहायता से तुम्हारा यह प्रयास इस बार अवश्य सफल होगा.
ब्रह्माजी के इसी आदेश पर अग्नि ब्राह्मणरूप में आए और क्षुधाशांत करने की विनती की.
अर्जुन ने अग्निदेव से कहा- हे अग्निदेव जो स्वयं देवराज इंद्र द्वारा रक्षित है मैं उसे नष्ट करने में कैसे समर्थवान हो सकता हूं. अभी तो मैं रथी भी नहीं हूं.
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