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राजा ने इसके लिए भगवान शंकर की तपस्या शुरू की.

भगवान शंकर प्रसन्न हुए और राजा श्वेतकि से इच्छा पूछी तो राजा ने अपनी विवशता बताकर एक योग्य पुरोहित देने की प्रार्थना की.

शिवजी ने कहा- मेरे ही अंश स्वरूप ऋषि दुर्वासा के पास जाकर उनको सेवा से प्रसन्न करो. उनसे उत्तम पुरोहित तुम्हें नहीं मिलेगा.

राजा श्वेतकि, शिवजी के आदेश पर दुर्वासाजी के पास पहुंचे. उन्होंने दुर्वासाजी को सेवा से प्रसन्नकर एक ऐसे महान यज्ञ का अनुष्ठान करवाने की विनती की जो इससे पहले कभी न हुआ हो.

दुर्वासाजी ने राजा श्वेतकि के लिए ऐसा महान यज्ञ का अनुष्ठान कराया.

उस यज्ञ के अग्निकुंड में बारह वर्ष तक अग्रिदेव को लगातार घी की अखण्ड आहूतियां दी गईं. आहुतियां लगातार दी गईं. अग्निदेव को कोई विराम ही न दिया गया.

इसका परिणाम यह हुआ कि अग्निदेव की पाचन शक्ति कमजोर हो गई. उनका रंग फीका पड़ गया और प्रकाश मन्द हो गया. वे अब किसी यज्ञ आदि के आह्वान पर प्रकट ही न होते थे. इससे बड़ा संकट पैदा हो गए.

यज्ञ अनुष्ठान में विघ्न पड़ने लगे. अग्निदेव को बाध्य होकर जहां प्रकट होना पड़ता वहां वह ज्यादा हविष्य ग्रहण ही न कर पाते.

अपच के कारण अग्निदेव बहुत परेशान हो गए. वे इसका निदान पूछने ब्रह्माजी के पास गए.

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