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उस कथा को समझने के लिए पांडवों की समस्या को भी संक्षेप में समझते चलते हैं तब स्थितियां ज्यादा स्पष्ट होंगी.
द्रोणाचार्य से शिक्षा लेकर कौरव-पांडव दोनों हस्तिनापुर आए तो प्रजा के मन में यह अभिलाषा जागने लगी कि युधिष्ठिर को युवराज नियुक्त कर दिया जाए.
धृतराष्ट्र को अपने विश्वसनीय दूतों से इसकी भनक लग गई थी. वह दुर्योधन को ही सिंहासन पर बिठाना चाहते थे लेकिन प्रजा का विद्रोह भी नहीं सह सकते थे.
भीष्म इसमें बहुत बड़े बाधक बनते क्योंकि उनका समर्पण सिंहासन के प्रति था. वह प्रजा की अभिलाषा देखकर युधिष्ठिर को इसे सौंप सकते थे.
इसलिए धृतराष्ट्र ने एक चाल चली. हस्तिनापुर युधिष्ठिर को राज्य के सबसे व्यर्थ समझे जाने वाले प्रदेश खांडवप्रस्थ का राजा बना दिया. खांडवप्रस्थ तो वन के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं.
इस तरह भाग्य पांडवों को उस वीरान जंगल में ले आया जिसपर तक्षक नाग और असुरों का आधिपत्य था.
पांडवों को उस जंगल को साफकर नया नगर बनाना था पर अग्नि क्यों उस वन को जलाकर खाने के लिए बैचैन थे. वास्तव में उस वन को जलाकर ही अग्नि को एक लंबी बीमारी की पीडा से मुक्ति मिल सकती थी. अग्नि के रोग का खांडववन से क्या संबंध, इसे जानते हैं.
श्वेतकि नामक एक धर्मनिष्ठ राजा थे. उन्होंने बहुत से बड़े-बड़े यज्ञ किए. उनके राज्य में सदैव यज्ञ होते ही रहते थे. राजा ने लगातार इतने यज्ञ करवाए कि राज्य के सभी ब्राह्मण थक गए.
उन्होंने राजा के सामने विनती कि वे अब और यज्ञ कराने में सक्षम नहीं हैं. उन्हें विश्राम की आवश्यकता है.
पर राजा श्वेतकि की इच्छा पूरी नहीं हुई थी. बलप्रयोग कर ब्राह्मणों से यज्ञ तो कराया नहीं जा सकता था इसलिए राजा को एक ऐसे पुरोहित की आवश्यकता थी जो यज्ञ की आहुतियां डालते और मंत्रोच्चार करते कभी थके ही नहीं.
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