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नारद ने कहा- तुम्हारी प्राण रक्षा का एक उपाय है. आज आधी रात यहां एक स्त्री आएगी.  उसे देखकर तुम जोर-जोर से रोना. वह तुम्हें बचा लेगी.

पर ध्यान रहे जब तक वह स्त्री तुम्हारे कष्ट दूर कर देने की सौगंध न ले ले, अपने कष्ट का कारण भूले से भी मत बताना.

एक ओर तो चित्रसेन को नारद ने यह समझाया, दूसरी ओर अर्जुन के महल पहुंचे और सुभद्रा से कहा- आज बड़ा पावन दिन है. आधी रात को यमुना स्नान तथा शरणागत की रक्षा करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है.

आधी रात को सुभद्रा अपनी सहेलियों के साथ यमुना-स्नान को पहुंची. वहां चित्रसेन रो रहा था. नारदजी ने किसी दुखी का कल्याण करने की बात सुभद्रा को कही थी.

सुभद्रा ने सोचा, “चलो, अक्षय पुण्य लूट ही लूं. उन्होंने रोने का कारण पूछा लेकिन वह बिना प्रतिज्ञा के बतलाने को राजी न था. हारकर सुभद्रा ने प्रतिज्ञा ली तो उसने सारा हाल कह सुनाया.

सुभद्रा धर्म-संकट में पड़ गईं. एक ओर श्रीकृष्ण की प्रतको A5ञा, दूसरी ओर अपनी प्रतिज्ञा. अंत में शरणागत का कल्याण करने का निश्चय किया और चित्रसेन को साथ ले गईं.

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