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विजय का दंभ और पुत्रों के अंत का दुख, पांडव आपे से बाहर हो गए. क्रोध में वे मर्यादा भूल कर भगवान शंकर से युद्ध को तैयार हो गए.
युदध शरू हो गया. पांडवों द्वारा जो भी अस्त्र-शस्त्र चलाये गये वे शिवजी के शरीर में जा कर जाने कहां विलीन हो गये.
चूंकि पांडव श्रीकृष्ण की शरण में थे और महादेव हरिभक्तों की रक्षा को स्वयं तत्पर रहते हैं.
इसलिए शांत स्वरूप भगवान शिव ने कहा- तुम श्रीकृष्ण के उपासक हो, उनके शरणागत हो इसलिए मैंने तुम्हें आज क्षमा कर दिया अन्यथा सभी इसी समय वध के योग्य हो.
परंतु मुझ पर आक्रमण के इस अपराध के परिणाम भोगने से नहीं बचोगा. तुम्हें कलियुग में जन्म लेकर इसका दंड भोगना पड़ेगा.
ऐसा कहकर भगवान शंकर अदृश्य हो गए. दुखी पांडव पापमुक्ति की राह पूछने भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में आए.
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यह कथा गढ़ी हुई है और गलत है। भविष्य पुराण को काफी हद तक बदला गया है। महाभारत युद्ध आरम्भ होने के बाद कहीं भी भगवान् शिव की पूजा का उल्लेख वेदकव्यास द्वारा कही गयी और भगवान् गणेश द्वारा लिखी “जय संहिता” यानि महाभारत के किसी खण्ड में नहीं है। इस कथा को पृथ्वीराज चौहान व् उनके कुल में उत्पन्न राजपूतों के वध हेतु झूठा बनाकर लिखा गया था, क्यूंकि आल्हा और उद्दल के महोबा राज्य की चौहान कुल से शत्रुता थी।
सत्य यह है कि राजस्थान के लोक गीतों व् स्थानीय इतिहास में आल्हा को भीम का व् उद्दल को युद्धिष्ठिर का अवतार माना जाता है, परन्तु इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस मान्यता का आधार यह भी है कि दोनों आल्हा व् उद्दल दैवीय शक्तियों से युक्त थे और स्वयं अश्वत्थामा ने पृथ्वीराज को दो शबदभेदि दिव्य बाण आल्हा और उद्दल मारने के लिए दिए थे, जिनमें से एक बाण सेचौहान ने आल्हा को मारा था व् दूसरे बाण से अपने सौतले मामा शाहबुद्दीन घुरी को।