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मध्यरात्रि में अश्वत्थामा, भोज (कृतवर्मा) और कृपाचार्य– ये तीनों पांडव शिविर के पास आए.

उन सभी ने भगवान् रूद्र को तैनात देखा तो ठिठके. आगे बढ़ने की हिम्मत ही न हुई. परंतु फिर उन सभी ने भगवान शिव की तरह-तरह से स्तुति आरंभ कर दी.

जल्दी ही प्रसन्न हो जाने वाले भगवान शिव प्रसन्न हो गए. अश्वत्थामा को उन्होंने वरदान मांगने को कहा.

अश्वत्थामा ने मांगा- प्रभु मुझे दो वरदान दीजिए. एक तो आपकी कृपा से मुझे एक ऐसा खड़ग मिले जिसके साधारण प्रहार से भी संसार का सबसे बड़ा महारथी भी दो भाग हो जाए.

दूसरा वरदान यह दीजिए कि मैं और मेरे साथी आज रात विजयी पांडवों के शिविर को अपनी इच्छानुसार निर्भय होकर देख सकें.

भगवान् शंकर ने अश्वत्थामा को एक विशेष तलवार प्रदान की और उन तीनों को ही पांड़वों के शिविर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी.

अश्वत्थामा ने महादेव द्वारा प्राप्त तलवार से धृष्टद्युमन और पांडवों के भ्रम में पांडव पुत्रों की हत्या कर दी.

फिर वह कृपाचार्य और कृतवर्मा के साथ वापस चला गया. शिविर में एकमात्र बचे पार्षद सूत ने इस जनसंहार की सूचना पांडवों को दी.

जब शिवजी स्वयं रक्षा कर रहे थे तो फिर कोई और ऐसा दुस्साहस कर ही नहीं सकता. भीम सहित सभी पांडवों के मन में आया कि यह कार्य तो शिवजी ने ही किया होगा.

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1 COMMENT

  1. यह कथा गढ़ी हुई है और गलत है। भविष्य पुराण को काफी हद तक बदला गया है। महाभारत युद्ध आरम्भ होने के बाद कहीं भी भगवान् शिव की पूजा का उल्लेख वेदकव्यास द्वारा कही गयी और भगवान् गणेश द्वारा लिखी “जय संहिता” यानि महाभारत के किसी खण्ड में नहीं है। इस कथा को पृथ्वीराज चौहान व् उनके कुल में उत्पन्न राजपूतों के वध हेतु झूठा बनाकर लिखा गया था, क्यूंकि आल्हा और उद्दल के महोबा राज्य की चौहान कुल से शत्रुता थी।
    सत्य यह है कि राजस्थान के लोक गीतों व् स्थानीय इतिहास में आल्हा को भीम का व् उद्दल को युद्धिष्ठिर का अवतार माना जाता है, परन्तु इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस मान्यता का आधार यह भी है कि दोनों आल्हा व् उद्दल दैवीय शक्तियों से युक्त थे और स्वयं अश्वत्थामा ने पृथ्वीराज को दो शबदभेदि दिव्य बाण आल्हा और उद्दल मारने के लिए दिए थे, जिनमें से एक बाण सेचौहान ने आल्हा को मारा था व् दूसरे बाण से अपने सौतले मामा शाहबुद्दीन घुरी को।

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