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नारद बोले देवराज, कितने दिनों के लिए इस सिंहासन पर विराजेंगे. यह न भूलिए कि भंडासुर की मति फिरी है. अभी शुक्राचार्य तपोरत हैं. जिस दिन वह तप से उठेंगे, भंडासुर को समझाकर मार्ग पर ले आएंगे. फिर क्या होगा. आपके लिए तो यह चार दिन की चांदनी ही रह जाएगी.
आनंद में मगन इंद्र और सभी देवता ठिठक गए और नारदजी से उसका उपाय पूछा.
नारद ने सुझाया कि कोई ऐसा इंतज़ाम करो कि दैत्यों का भय हमेशा के लिए चला जाए. आप सब एक साथ आदिशक्ति, पराशक्ति की पूजा करो. नारद ने पराशक्ति को प्रसन्न करने की विधि भी समझा दी.
शुक्राचार्य को पता चल गया और वे तप रोकर भंडासुर के पास आए.
उन्होंने भंडासुर को समझाया- देवतागण हिमालय पर पराशक्ति की पूजा कर रहे हैं. यदि उन्होंने पराशक्ति को प्रसन्न करके मनचाहा वरदान मांग लिया तो तुम्हारा अनिष्ट होना तय है. अपना अस्तित्व देखना चाहते हो तो देवताओं की पूजा में विध्न डाल दो.

भंडासुर दल-बल लेकर देवताओं पर चढ बैठा. पर वह इससे पहले कि उनके समीप आ पाता इससे पहले ही पराशक्ति ने उसके और देवताओं के बीच दिव्य तेज की एक दीवार खड़ी कर दी. अब तो भंडासुर जल उठा.
उसने दानवास्त्र चलाया. दीवार टूट गयी. पर पलक झपकते ही दीवार फिर जस की तस थी. भंडासुर ने उस पर वायव्यास्त्र चला दिया. दीवार एक बार फिर टूटी पर तुरंत पहले जैसी हो गयी. इसी तरह जब कई बार हुआ. असफल भंडासुर झुंझलाकर शोणितपुर लौट आया.
भंड लौट तो गया पर देवता डर के मारे कांपने लगे कि अगर यह दीवार न रहेगी तो क्या होगा. दो ही रास्ते बचे या तो पराअम्बा को प्रसन्नकर उनका दर्शन और आशीर्वाद पाएं या भंडासुर के हाथों मारे जायें. देवताओं ने आराधना और बढा दी.
पराम्बा दिव्य कन्या रूप में प्रकट हुईं. ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी वहां पहुंचे. ब्रह्मा ने सोचा पराम्बा अगर यहीं रहें तभी रक्षा सम्भव है. इसके लिए उन्हें सांसारिकता में बांधा जाए.
उन्होंने सोचा क्यों न पराशक्ति का विवाह करा दिया जाए. अब पराम्बा से विवाह के लिए योग्य वर कौन हो जो उनके तेज को सहन कर ले?
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