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उन सबको राजा ऐसे ही सम्बोधित करते रहे. मन्त्रीगण आपस में चर्चा करने लगे कि क्या बात है राजा सभी को एक ही तरह से सम्बोधित कर रहे हैं. इसके पीछे कोई न कोई राज अवश्य है.

अंत में उस सभा में संस्कृत के मूर्धन्य महाकवि कालिदास पधारे तो राजा ने उनसे भी यही कहा- आइये मूर्खराज. कवि शिरोमणि कालिदास ने अपनी बुद्धि चातुर्य का परिचय देते हुए राजा को तत्क्षण जवाब दिया.

खादनपि न गच्छामि हसन्नपि न जलम् पिबामि, गतमपि न शोचामि कृतम् न मन्ये!!
द्विभ्याम् न त्रितयो स्वयं न कथय्यामि कीर्ति किम् कारणम् भोज: भवामि मूर्ख !!
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2 COMMENTS

    • आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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