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उसके बाद मैंने घी वाले घड़े पर वार किया. वह घड़ा भी तत्काल फूट गया और घी नदी के बहाव की दिशा में बहने लगा.
बुद्ध बोले- ठीक है! अब जाओ और उन पंडितों से कहो कि कोई ऐसी पूजा, यज्ञ, इत्यादि करें कि वे पत्थर पानी के ऊपर तैरने लगें और घी नदी की सतह पर जाकर बैठ जाए.
युवक हैरान होते हुए बोला- यह आप कैसी बात करते हैं? पंडित चाहे कितनी भी पूजा करे लें पत्थर कभी पानी पर नहीं तैर सकता और घी कभी नदी की सतह पर जाकर नहीं बैठ सकता!
बुद्ध बोले- बिलकुल सही और ठीक ऐसा ही तुम्हारे पिताजी के साथ है. उन्होंने अपने जीवन में जो भी अच्छे कर्म किये हैं वे उन्हें स्वर्ग की तरफ उठाएंगे और जो भी बुरे कर्म किये हैं वे उन्हें नरक की ओर खीचेंगे. तुम चाहे जितनी भी पूजा करा लो, कर्मकाण्ड करा लो, तुम उनके कर्मफल को रत्ती भर भी नहीं बदल सकते.
युवक बुद्ध की बात समझ चुका था कि मृत्यु के पश्चात स्वर्ग जाने का सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है जीवित रहते हुए अच्छे कर्म करना.
स्वर्ग और नर्क की गति जीवनकाल में किए हमारे कर्मों से निर्धारित होती है. शरीर से प्राण निकल जाने के बाद उसके लिए चाहे जितनी भी पूजा या कर्मकांड कर लें, कर्मों का फल बदलता नहीं है.
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