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तो देवतागण बोले- हे प्रभु आप अनंतकोटि ब्रम्हाण्ड के नायक हैं. ऐसे प्रभु को यह छाछ छुपानी पड़ी है, इसका अर्थ तो यही है कि ये अनमोल है. एक घूंट हमें भी मिल जाए तो हमारा भी कल्याण हो जाए.
प्रभु अब हम आपके धाम में आए हैं. इतनी कृपा तो कर दें. सेवक न सही प्यासे अतिथि समझकर ही एक घूंट हमें भी पिला दें. हम भी इसका स्वाद लेकर धन्य हो जाएं.
भगवान बोले- देवता गण संसार की कोई भी वस्तु आपके लिए दुर्लभ नहीं. मैं स्वयं आपके लिए प्रस्तुत हूं. आपकी हर इच्छा मेरे लिए आदेश पर ये छाछ न दे पाउंगा.
स्वर्ग के अमृत पर आपका अधिकार है. आप उसे जितनी इच्छा पी सकते हैं पर ये छाछ ब्रजवासियों की मेरे लिए श्रद्धा, प्रेम है. ये छाछ तो मैं ही पिऊँगा. मेरे भक्तों ने इसे मेरे लिए बनाया है. उनका मन कैसे न रखूं.
अब तो देवताओं का कौतूहल बढ़ गया. कामधेनु और नंदा गाय भी सहर्ष उनके लिए समस्त पदार्थ प्रस्तुत कर देती हैं. यदि ये छाछ उनके दूध से बना हो तो भी उनके लिए सहज उपलब्ध होना चाहिए. लेकिन प्रभु कह रहे हैं कि यह ब्रज की गाय के दूध का है.
आखिर चक्कर क्या है! जैसे उधो तैसे माधव, न श्रीकृष्ण हठ छोड़ें न ही देवता. बात वहीं घूम रही है. देवों ने फिर से पूछा- प्रभु ऐसी कौन सी अनमोल बात है इस छाछ में जो हम नहीं पी सकते.
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