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उद्दालक को अब पछतावा होने लगा कि क्रोध में उन्होंने यह क्या कर दिया. परंतु विवश थे.
नचिकेता पिता की आज्ञा लेकर यमपुरी के लिए चले. काल से पूर्व ऐसे तपस्वी को आया देखकर स्वयं यमराज कांप उठे.
नचिकेता यम के द्वार पर बैठे रहे. यमराज धर्मसंकट में थे. समय से पूर्व वह नचिकेता को स्थान दे नहीं सकते थे और किसी अग्नितुल्य तेजस्वी ॠषिकुमार का स्वागत नहीं करते तो उससे भी दोष के भागी होते.
इसी उलझन में यमराज फंसे रहे और नचिकेता ने बिना अन्न-जल ग्रहण किए तीन रात यमपुरी के द्वार पर बिता दिए. हारकर यम स्वयं जल से भरा स्वर्ण-कलश अपने ही हाथों में लिए दौड़े.
उन्होंने नचिकेता के पांव पखारे फिर कहा- हे तपस्वी कुमार! पूज्य अतिथि होकर भी आपने मेरे द्वार पर तीन रात्रियां निराहार बिता दीं. यह मुझसे बड़ा अपराध हो गया. आप प्रत्येक रात्रि के लिए एक-एक वर मुझसे मांग लें.
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