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ऐसा कहकर शिवजी ने अपने माथे से निकले तेज को क्षीरसागर में डाल दिया फिर लीलाधारी भगवान अंतर्धान हो गए. इंद्र और बृहस्पति दोनों भयमुक्त होकर बहुत सुखी हुए.

कार्तिक महात्मय नौंवा अध्याय समाप्त. कथा जारी रहेगी.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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