राम-रावण युद्ध जब निर्णायक मोड़ पर था. मायावी शक्तियों का प्रयोगकर रावण, वानर सेना को डराकर उसका मनोबल तोड़ने लगा. भगवान श्रीराम इससे चिंतित थे. देवताओं के संग आकाश से युद्ध देख रहे अगस्त्य मुनि श्रीराम के पास आए. उन्होंने कहा कि आसुरी शक्तियां प्रकाश से क्षीण पड़ती हैं. प्रकाश और ऊर्जा के अक्षय स्रोत भगवान सूर्य की आराधना कीजिए ताकि वह अपने तेज से शत्रुओं के मन में भय पैदा करें. भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अगस्त्य मुनि ने प्रभु श्रीराम को अत्यंत गोपनीय और कल्याणकारी आदित्यहृदय स्तोत्र दिया जो शत्रुओं के हृदय में भय पैदा करता है.
आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से करते रहने से हृदय रोग में, मिर्गी, ब्लड प्रेशर और मानसिक रोगों में लाभ मिलता है। इसके पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता और आत्मविश्वास में जबरदस्त वृद्धि होती है.
आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ का आरंभ शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से करना शुभ माना गया है.
‘आदित्यहृदय स्तोत्र’
विनियोग
ॐ अस्य आदित्य हृदय स्तोत्रस्य अगस्त्य ऋषिः अनुष्टुपछन्दः, आदित्य हृदयभूतो
भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ता शेषविघ्नतया ब्रह्मविद्या सिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास (प्रत्येक श्लोक के साथ बताए गए अंगों को स्पर्श करें)
ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि(सिर को स्पर्श करें)। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे(मुख को स्पर्श करें)। आदित्य हृदयभूत ब्रह्म देवतायै नमः हृदि(हृदय को स्पर्श करें)।
ॐ बीजाय नमः गुह्यो(नितंबों को स्पर्श करें)। रश्मिमते शक्तये नमः पादयो(पैरों को स्पर्श करें)। ॐ तत्सविर्तु आदित्य गायत्री कीलकाय नमः नाभौ (नाभि स्पर्श करें)।
करन्यास(प्रत्येक श्लोक के साथ बताए गए अंगों को स्पर्श करें)
ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः(तर्जनी से अंगूठे को स्पर्श करें)। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः(अंगूठे से तर्जनी को स्पर्श करें)।
ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः(अंगूठे से मध्यमा को स्पर्श करें)। ॐ विवस्वते अनामिकाभ्यां नमः(अंगूठे से अनामिका को स्पर्श करें)।
ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः(अंगूठे से छोटी अंगुली को स्पर्श करें)। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः(दोनों हथेलियों को स्पर्श करें)।
हृदयादि अंगन्यास(प्रत्येक श्लोक के साथ बताए गए अंगों को स्पर्श करें)
ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः(हृदय को स्पर्श करें)। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा(सिर को स्पर्श करें)।
ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट् (मस्तक के मध्य की शिखा को स्पर्श करें)।
ॐ विवस्वते कवचाय हुम्(बाएं हाथ से दाहिना कंधा और दाहिने हाथ से बायां कंधा स्पर्श करें)।
ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्(तर्जनी से दायीं आंख, अनामिका से बायीं आंख और मध्यमा से दोनों आंखों के मध्य त्रिनेत्रस्थल को स्पर्श करें)।
ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्(दोनों कंधों को झटका देकर सावधान की मुद्रा लें)।
इस प्रकार संपूर्ण इन्द्रियों का न्यास करके नीचे लिखे मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
आदित्यहृदय स्तोत्र
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।।1।।
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुम् अभ्यागतो रणम्।
उपगम्या ब्रवीद् राम अगस्त्यो भगवांस्तदा।।2।।
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।।3।।
आदित्य हृदयं पुण्यं सर्वशत्रु विनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यम् अक्षयं परमं शिवम्।।4।।
सर्वमंगल मांगल्यं सर्वपाप प्रणाशनम्।
चिन्ता शोक प्रशमनम आयुर्वधनम् उत्तमं।।5।।
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुर नमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।।6।।
सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मि भावनः।
एष देवासुर गणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।।7।।
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।।8।।
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।।9।।
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।।10।।
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्त सप्तिम् अरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भू स्त्ष्टा मार्तण्डकों अंशुमान्।।11।।
हिरण्यगर्भः शिशिर स्तपनोऽहरकरो रविः।
अग्नि गर्भो अदितेः पुत्रः शंखः शिशिर नाशनः।।12।।
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्य वीथीप्लवंगमः।।13।।
आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविः विश्वोः महातेजा रक्तः सर्वत् उदभवः।।14।।
नक्षत्र ग्रह ताराणाम् अधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादश आत्मन् नमोऽस्तु ते।।15।।
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।16।।
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।।17।।
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्म प्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।18।।
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ।।19।।
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।।20।।
तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।21।।
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।।22।।
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।।23।।
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।।24।।
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।।25।।
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति।।26।।
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।।27।।
एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्।।28।।
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।।29।।
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्।।30।।
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।31।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पंचाधिकशततमः सर्गः।
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
