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विष्णुलोक में भी वर्षों तक रहकर फिर तुम लोग मनु-शतरूपा के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होकर घोर तप करोगे और भगवान को पुत्ररूप में अपने घर आमंत्रित करोगे.
तप से प्रसन्न होकर भगवान तुम्हें पुत्ररूप में आने का वरदान देंगे. जिसके फलस्वरूप तुम राजा दशरथ के रूप में जन्म लोगे और यह आधे पुण्यों की फलभागिनी कलहा तुम्हारी कैकेयी नामक रानी होगी. स्वयं भगवान विष्णु साकार रूप लेकर श्रीराम के रूप में तुम्हारे घर अवतरित होंगे.
कलहा भगवान को स्वयं तो जन्म नहीं देगी किंतु भगवान के प्रिय सेवक इसके गर्भ से जन्मेंगे.
भगवान एक लीला में कलहा का सहयोग लेंगे और उसी लीला के क्रम में बहुत से जीवों का उद्धार करेंगे.
यह कहते हुए दोनों पार्षद कलहा को लेकर चल दिए.
कालांतर में बात अक्षरशः चरितार्थ हुई. जब दशरथ-कौशल्या के घर निर्गुण-निराकार ने सगुण-साकार रूप धरकर पृथ्वी को पावन किया.
कितनी महत्ता है हरिनाम एवं हरिध्यान की! श्वास-श्वास में प्रभुनाम के रटने के प्रभाव से धर्मदत्त ब्राह्मण को दशरथ के रूप में भगवान के पिता होने का गौरव प्रदान कर दिया! सच ही है कि शुभ कर्म व्यर्थ नहीं जाते.
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