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महंथजी ने दीक्षा देने से साफ मना किया. काशी के पंडित इकट्ठे हो गए. अब यह देखना था कि जुलाहा सच्चा कि रामानंदजी सच्चे.
काशी में शोर हो गया. यह निर्णय देखने के लिए भीड़ जमा हो गयी. कबीरदासजी को बुलाया गया. गुरु महाराज मंच पर विराजमान हैं. सामने विद्वान पंडितों की सभा है.
रामानंदजी ने कबीर से पूछा- मैंने तुम्हें कब दीक्षा दी? मैं कब तेरा गुरु बना? तू ऐसा लोगों से क्यों कहता फिरता है?
कबीरदासजी बोले- गुरू महाराज! उस दिन भोर में आपने मुझे पादुका-स्पर्श कराया और राममंत्र भी दिया, वहां गंगा के घाट पर. आप स्नान को जब जा रहे थे. फिर सारी बात सरलता से सुना दी.
रामानंद स्वामी ने कबीरदासजी के सिर पर धीरे-से खड़ाऊँ मारते हुए कहा- राम…राम…राम… मुझे झूठा बनाता है? गंगा के घाट पर मैंने तुझे कब दीक्षा दी थी?
कबीरदासजी बोल उठे- गुरु महाराज! मैं तब की दीक्षा झूठी मान लेता हूं पर अब की तो सच्ची है…! आपके मुख से राम नाम का मंत्र भी मिल गया और सिर पर आपकी पावन पादुका का स्पर्श भी हो गया.
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