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महादेव ने कहा- मेरे इस स्वरूप में जो अर्धभाग आपको मेरे सामान्य स्वरूप से अलग दिखा वही स्त्रीतत्व है. आप इसे अच्छे से देख समझ लें. मैं आपको मैथुनी सृष्टि के आरंभ का आधार प्रदान कर रहा हूं. आप मेरे इसी स्वरूप के आधार पर सृष्टि की कल्पना करिए.
यही तत्व मूलतत्व होगा सृष्टि वृद्धि का. आगे चलकर देवी रूप में इनका प्रादुर्भाव सबके समक्ष हो. यह तत्व मेरे साथ ही अस्तित्व में है परंतु अभी तक परिलक्षित नहीं हुआ था. अब उसका समय आ रहा है.
आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर देता हूं. स्त्रीतत्व में अपनी संतति यानी संतान के गुणधर्म में बदलाव और सुधार की क्षमता होगी. वह समय-समय पर अपने अंशों में बदलाव लाने में समर्थवान होगी.
ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि एक कल्प के बाद सृष्टि समाप्त होगी. हर प्रलय के बाद जीव के सामने एक नई चुनौती होगी. उस चुनौती के अनुकूल अपनी संतान को यह स्त्रीत्व ही बनाएगा.
अब आज के संदर्भ में देखें तो जीनोम में यही बात कही गई है. विज्ञान यही तो कह रहा है. म्यूटेशन आदि भी इसी बात को प्रमाणित करने का प्रयास कर रहे हैं. इस विषय पर विषद चर्चा जल्द ही होगी. अभी तो कथा आगे बढ़ाता हूं.
महादेव ने कहा- प्रजा वृद्धि के आपके प्रयत्नों से मैं प्रसन्न हूं. आप अपना कार्य आरंभ करिए.
ऐसा कहकर शिव ने अपने शरीर के आधे भाग से शक्ति को अलग कर दिया. ब्रह्मा ने शिव के अर्ध अंश को प्रणाम करके उनकी स्तुति आरंभ की.
हे शिवे, आपके स्वामी के आदेश से मैं सृष्टि की रचना के लिए प्रेरित हुआ हूं. मैं अभी तक नारी कुल का सृजन नहीं कर पाया. नारी कुल की रचना मेरे सामर्थ्य के बाहर है.
हे देवी! आप संपूर्ण शक्तियों का उद्गम स्रोत हैं. आप मुझे नारी की रचना की क्षमता प्रदान करें. आपसे विनती है कि आप मेरे पुत्र दक्ष की कन्या रूप में जन्म लेकर मेरी कल्पना को साकार करें.
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