हमने आपको पूर्व की कथा में बताया था कि महादेव का एक उपासक शिवस्वरूप को प्राप्त कर शिव की सेवा में लग गया. कई हजार साल बाद महादेव ने उसे सनातन की रक्षा के लिए वेताल के रूप में पृथ्वी पर भेजा.

भगवती ने रूद्रकिंकर यानी वेताल को महादेव भक्त राजा विक्रमादित्य के सिंहासन बत्तीसी की सुरक्षा में तैनात कर धर्मरक्षा में सहयोगी बनने का आदेश किया. वेताल ने राजा को नीतिगत कथाएं सुनाईं उसे विक्रम-वेताल संवाद कहा जाता है. पढ़ें एक और कथा-

रुद्रकिंकर यानी वेताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा– राजन! प्राचीन काल में पुण्यपुर नगर में धर्मवल्ल्भ नामक एक राजा राज्य करता था. सत्यप्रकाश उसका मंत्री था. सत्यप्रकाश बहुत ज्ञानी और गुणी था.

राजा धर्मवल्लभ ने एक बार मंत्री से कहा– मंत्रीवर! मैं राजा हूं सभी प्रकार के आनंद उठा सकता हूं, ऐसे में आनंद के कितने प्रकार के होते हैं? यह मुझे बताओ.

सत्यप्रकाश ने कहा, ‘महाराज ! आनन्द मूलत: चार प्रकार के हैं- पहला ब्रह्मचर्य आश्रम का आनंद यह ब्रह्मानंद हैं और श्रेष्ठ है. दूसरा गृहस्थाश्रम का आनंद जिसे विषयानंद कहते हैं जो मध्यम है.

तीसरा वानप्रस्थ का धर्मानंद यह बस सामान्य है और चौथा संन्यास में जो शिवानन्द की प्राप्ति है, सत्य तो यह है कि यही आनंद सबसे बढिया है.

राजा ने कहा ब्रह्मचर्य तो बीत गया, अब गृहस्थाश्रम का विषयानंद ही ले सकता हूं. यह स्त्री-प्रधान है क्योंकि गृहस्थ-आश्रम का आनंद स्त्री के बिना कैसे पूरा हो सकता है. इसलिए सत्यप्रकाश, मेरे अनुरूप कोई स्त्री ढूंढो.

सत्यप्रकाश ने देश विदेश छान मारा पर राजा के योग्य स्त्री नहीं मिली. वह सिन्धु देश में आकर समुद्र की ओर बढ़ा. हर ओर से निराश सत्यप्रकाश ने समुद्र से प्रार्थना की- आप सभी रत्नों के भंड़ार हैं, निस्संदेह स्त्री रत्न भी आपके पास होगी.

उसने समुद्र की स्तुति शुरू की- हे गंगा आदि नदियों के स्वामी जलाधीश! आपको नमस्कार है, मैं आपका शरणागत हूं. कृपया मेरे राजा के लिए आप उत्तम स्त्री-रत्न प्रदान करें. यदि ऐसा नहीं किया तो मैं अपने प्राण यहीं दे दूँगा.

समुद्रदेव स्तुति से प्रसन्न हुए और उसी क्षण जल में से माणिक के चौड़े पत्तेवाला, हीरे मोती के फलों से लदा एक पेड़ प्रकट हुआ. पेड़ पर एक अत्यंत सुंदर, सुकुमारी कन्या बैठी थी. देखते ही देखते वह कन्या वृक्ष सहित समुद्र जल में समा गयी.

यह सब देखकर मंत्री सत्यप्रकाश तो भौंचक ही रह गया. राजा के पास लौट आया और सारी बातें राजा को जस की तस सुना दी. सुनकर राजा भी चकित. दोनों समुद्र के किनारे आए.

राजा ने भी देखा कि जल से एक चमचमाता पेड़ निकला जो बड़े-बड़े मोतियों और तमाम रत्नों से लदा है. उस वृक्ष पर उसने उसी सुंदर कन्या को बैठा देखा और राजा के देखते ही देखते वह पेड़ कन्या समेत जल में समा गया.

इस अद्भुत दृश्य को देखकर राजा अपने को रोक न सका. वह समुद्र में कूद पड़ा. सत्य प्रकाश ने दिनभर प्रतीक्षा की फिर यह सोचकर लौट गया कि बाद में फि आएगा.

उधर राजा उसी कन्या के साथ पाताल में पहुंच गया. कन्या दिखी तो राजा ने उससे कहा- मैं पृथ्वी से तुम्हारे लिए यहाँ तक आया हूँ. मेरे साथ गन्धर्व विवाह कर लो.

कन्या ने हँसकर कहा– ‘हे राजन! अबकी कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि जब आयेगी, तब समुद्र तट के देवी-मंदिर में मेरी प्रतीक्षा करना मैं वहीं आकर तुम्हें मिलूंगी.

राजा पाताल से पृथ्वी पर लौट आया और कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की प्रतीक्षा करने लगा. अंतत: वह दिन आ ही गया. उस दिन वीर वेश में सुसज्जित हो देवी के मंदिर में गया.

वह कन्या राजा से पहले ही मंदिर में आ चुकी थी. राजा कन्या के पास पहुंचता उससे पहले बकवाहन नाम का एक राक्षस वहां पहुंच गया. राक्षस आते ही कन्या को अपने बाहुपाश में भरने का यत्न करने लगा.

यह देखकर राजा का क्रोध भड़क उठा. उसने तत्काल राक्षस का सिर काट गिराया. अचरज के साथ उसने कन्या से कहा– सच बताओ, यह कौन था और यहाँ कैसे आया और उसने ऐसा दुस्साहस क्यों किया?

कन्या ने कहा- राजन! मैं विद्याधर की कन्या मद्वती हूं. मैं पिताजी की अतिप्रिय हूँ. एक बार मैं वन में गयी और भोजन के समय घर में नहीं पहुंच सकी. यह परंपरा के प्रतिकूल था.

मेरे पिताजी ने ध्यान के द्वारा सारा वृत्तान्त जान लिया, उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि इस अपराध के चलते कृष्ण चतुर्दशी को तुमको राक्षस ग्रहण करेगा.

शाप सुनने के बाद मैं पिताजी से रोते हुए पूछा, मेरी इस शाप से मुक्ति का क्या उपाय है?’ उन्होंने कहा- बेटी इसी तिथि को यदि कोई राजा तुम्हें ग्रहण करेगा तब तुम्हारे शाप की निवृत्ति हो जाएगी.

मद्वती ने राजा से कहा- आपकी कृपा से आज मैं शाप से मुक्त हो गयी. अब आज्ञा दें तो मैं अपने पिता के घर जाऊं. राजा तो कन्या के वशीभूत थे. बोले- पहले तुम मेरे साथ मेरे घर चलो. इसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे पिता के पास ले चलूँगा.

कन्या राजा की बात मानकर महल में आई तो राजा ने विलंब किए बिना शानदार समारोह आयोजित कर उससे विवाह कर लिया. मंत्री ने देखा कि राजा के साथ विवाह करने वाली समुद्र से निकलने वाली वही मायावी दिव्य कन्या है.

कुछ दिनों बाद मंत्री अचानक अपने महल में मृत पाया गया. वेताल ने पूछा– राजन! अब यह बताओ, इस पूरे प्रकरण से उस मंत्री के मरने में क्या संबंध या कारण है? क्या रहस्य है?

राजा विक्रम ने कहा– मंत्री सत्यप्रकाश राजा का मित्र और प्रजा का हितैषी था. उसने ही मद्वती को राजा के लिए ढूंढा था. मदवती को पाकर राजा विलासी हो दिन-रात विषय-सुख में ही लिप्त रहने लगे और राज्य एवं प्रजा की उपेक्षा करने लगे.

सत्यप्रकाश ने भांप लिया कि शीघ्र ही इस राज्य का विनाश होनेवाला है क्योंकि जब राजा विषयी एवं स्वार्थी बन जाता है, तब राज्य का नाश अवश्य होता है.

ऐसी स्थिति में मेरे परामर्श का क्या लाभ! राज्य के विनाश को अपनी आँखों से देखने से पहले जान दे देना की ठीक है. वेताल! यही सोच कर मंत्री सत्य प्रकाश ने अपने प्राण त्याग दिये.

(स्रोत: भविष्य पुराण प्रतिसर्ग पर्व द्वितीय खंड का चतुर्थ अध्याय)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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