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डाकिनी राजकुमारी कथा अंतिम भाग

राजकुमार को व्याकुल देख दीवान का बेटा बोला- आप राजकुमारी के लिए व्याकुल हैं. वह मुझे रास्ते का कांटा समझती है. ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे हम उसे घर ले चलें. मैं उसे तभी तक खटक रहा हूं जब तक वह आपसे विवाह नहीं कर लेती.

यदि आप उसे अपने घर ले जाए तथा उसके मन से यह भय निकल जाए कि मैं और मेरी चतुराई आपके उसके साथ प्रेम के लिए बाधा नहीं है तो राजकुमारी समान्य व्यवहार करने लगेगी.

मंत्री के बेटे ने राजकुमार को कुछ समझाया और फिर उस रात राजकुमारी के पास जाऩे को कहा. उसने बताया कि जब राजकुमारी सो जाए तो उसकी बायीं जांघ पर त्रिशूल जैसा निशान बनाकर उसके अधिकतर गहने लेकर चले आना.

राजकुमार ने मित्र के कहे अनुसार किया. उसी रात राजकुमारी के कक्ष में पहुंचा. राजकुमारी के पूछने पर बताया कि मित्र सकुशल है. उसको खाना देने के बाद आपके आकर्षण के चलते मैं शीघ्र लौट आया उसके खाने की प्रतीक्षा नहीं कर सका.

राजकुमारी ने कहा- आप बहुत दिनों बाद मित्र से मिले थे. आपको उसके साथ समय बिताकर अपने सामने ही भोजन करवाना चाहिए था. फिर भी आप मिले और बात कर लौट आए यह भी ठीक है. कुछ समय बाद राजकुमारी को नींद आ गयी.

राजकुमार ने उसके गहने समेटे और उसकी बायीं जांघ पर त्रिशूल जैसा निशान बना कर भोर होने से पहले ही निकल भागा और सकुशल लौट कर अपने मित्र से आ मिला.

दीवान के बेटे ने गहने लिए फिर योगी का भेस बनाया और श्मशान में जा बैठा. सुबह होने पर उसने राजकुमार से कहा कि तुम ये गहने लेकर बाज़ार जाओ. इसे सुनार को बेच देना.

राजकुमार ने हिचकिचाहट के साथ कहा- चोरी का माल बेचते हुए किसी ने धर लिया तो? ये गहने मामूली नहीं राजकुमारी के हैं और कई गहनों पर राजचिह्न भी अंकित है.

दीवान के बेटे ने कहा कि ऐसा हो तो सकता है पर इसमे घबराने की कोई बात नहीं. यदि किसी ने पकड़ लिया तो उससे साफ-साफ कह देना कि गहने मेरे गुरु ने दिए हैं. मेरे गुरु के पास चलो जो पूछना है उनसे पूछो, और उसे यहां ले आना.

राजकुमार गहने लेकर शहर गया और महल के पास एक बड़े सुनार को उन्हें दिखाया. देखते ही सुनार की आंखें फैल गयीं. उसने उन्हें पहचान लिया. राजकुमार को दुकान में बैठाकर बहाने से कोतवाल के पास गया.

कोतवाल ने राजकुमार को बुला भेजा. सुनार उसको साथ लेकर पहुंचा तो कोतवाल ने उससे गहनों के बारे में पूछा. राजकुमार ने कह दिया कि ये गहने तो मेरे गुरु ने दिए हैं. जो पूछना है उनसे पूछो. कोतवाल ने सैनिक भेज गुरु को भी पकड़वा लिया.

बात राजकुमारी के गहने की थी सो सभी को राजा के सामने प्रस्तुत किया गया. राजा ने कोतवाल से सारी बात सुनने-समझने के बाद योगी से पूछा- महाराज, आपको गहनों से क्या लेना देना. ये गहने आपको कहाँ से मिले?

योगी बने दीवान के बेटे ने कहा- महाराज, मैं श्मशान में काली चौदस की आधी रात को डाकिनी-मंत्र सिद्ध कर रहा था. मंत्र सिद्ध होते ही वहां की डाकिनी आ गयी. मैंने उसके गहने उतार लिए और उसकी बायीं जांघ में त्रिशूल का एक निशान बना दिया.

इतना सुनकर राजा अपने सिंहासन से उछल गया. तत्काल महल के भीतर रनिवास में गया. राजा ने रानी को कहा कि पद्मावती की बायीं जांघ पर देखो कि कहीं कोई त्रिशूल जैसा निशान तो नहीं है. रानी ने देखा, तो निशान मौजूद था.

राजा को बड़ा अचंभा और दु:ख हुआ. बाहर आकर वह योगी को एक ओर ले जाकर बोला- महाराज,मैं बहुत दुःखी हूं कृपया मेरी एक शंका का निवारण करें. धर्मशास्त्र में खोटी स्त्रियों के लिए क्या दण्ड है?

योगी ने उत्तर दिया- राजन! ब्राह्मण, गऊ, स्त्री, लड़का और अपने आसरे में रहने वाले से कोई खोटा काम हो जाए तो उसे देश-निकाला दे देना चाहिए. अपने राज्य की सीमा पार किसी जंगल पर्वत पर छोड़ आना चाहिए.

यह सुनकर राजा महल के भीतर चला गया. योगी और उसके शिष्य बने राजकुमार भी लौट गए. अब दोनों की निगाहें राज्य की सीमा से लगने वाले जंगल की ओर थीं. राजा ने भारी मन से पद्मावती को डोली में बिठाकर जंगल में छुड़वा दिया.

राजकुमार और दीवान का बेटा तो ताक में ही थे. राजकुमारी को अकेली देख उसे ढांढस बंधाया. राजकुमारी इन दोनों के साथ चल पड़ी. राजकुमार, राजकुमारी को लेकर अपने नगर लौट आए और बड़े आनंद से रहने लगे.

कहानी सुनाकर बेताल बना रुद्रकिंकर विक्रमादित्य से बोला- राजन! इस कहानी में अन्याय हुआ यह तो स्पष्ट दिख रहा है. अब यह बताएं कि राजकुमार, दीवान के बेटे, राजकुमारी और राजा में से कौन है, जो पाप का भागी होगा, और क्यों?”

विक्रमादित्य ने कहा- पाप तो राजा को ही लगेगा. दीवान के बेटे ने अपने स्वामी का काम किया. कोतवाल ने राजा का कहना माना और राजकुमार ने अपना मनोरथ सिद्ध किया और उसके लिए कई उपक्रम किए.

राजा ने बिना विचारे अपनी बेटी को डाकिनी मानकर उसे देश-निकाला दे दिया यह पाप है. राजा को अपनी प्रजा के विषय में दंड का विधान करने से पहले अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए. राजा की संतान भी उसकी प्रजा की तरह है. प्रमाण की सत्यता की परखा का दायित्व दंड देने वाले का होता है.

राजा को प्रजा के लिए ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है. राजा ने अपना दायित्व नहीं निभाया. इसलिए समस्त पाप उसके हिस्से आएगा. जिस राज्य में दंड विधान दोषपूर्ण होने लगे उसका पतन निश्चित हो जाता है.

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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