गणेश चतुर्थी के बारे में पुराणों में आता है कि इसी दिन महागणपति भगवती पार्वती की लालसा पूरी करने के लिए प्रकट हुए थे. गणेश जी भी शिव, नारायण, भगवती, सूर्य, ब्रह्मा आदि की तरह आदि देव हैं. वह न तो शिव के वीर्य और न ही जगदंबा के रज से जन्मे हैं. उन्होंने तो पार्वती जी की लालसा पर उनके घर में पुत्ररूप में अवतार लिया. वह भी उबटन से. जैसे कृष्ण जो कि नारायण हैं वह देवकी-वासुदेव की पुत्र नहीं है. वह तो उनका एक रूप है अवतार वाला. वह इस तरह के ऐसे अनंत रूप धर चुके हैं. उसी तरह गणेशजी को समझना चाहिए.
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आशा है कि आपके दिमाग से यह भ्रम निकल गया होगा. ज्यादातर लोग यही मानकर चलते हैं कि गणपति तो बस शिव-पार्वती के पुत्र हैं. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि शिव-पार्वती के विवाह में गणेशजी की पूजा स्वयं ब्रह्माजी ने कराई थी. अब सोचिए माता-पिता के विवाह में पुत्र की पूजा कैसे हो सकती है? और ब्रह्माजी कोई अनिष्ट या अमर्यादित कार्य कैसे करा सकते हैं? कहने का अर्थ है कि आप गणपति को बड़े संदर्भ में देखें. उनके सिर्फ पार्वतीनंदन अवतार के रूप में नहीं.
उसी तरह गणेशजी के शरीर के आकार पर भी लोग ध्यान नहीं देते. आखिर क्यों है ऐसा इनका शरीर. क्यों है ऐसा रूप. सबकुछ यूं ही नहीं है. इसके पीछे बड़े ठोस कारण हैं. इनकी चर्चा गणेश पुराण में की गई है. आज हम आपको संक्षेप में कुछ बताएंगे जो आपको जानना चाहिए. आप जरूर ही यह भूल करते आए होंगे. आशा है आगे से सावधान रहेंगे, खासतौर से गणेश जी की प्रतिमा स्थापना पर तो जरूर ही ध्यान रखेंगे.
गणेशजी के बारे में हर किसी को होनी चाहिए कुछ जरूरी जानकारियां
गणेश चतुर्थी से शुरू होता दस दिनों का वार्षिक गणेश उत्सव. श्रीगणेश जी को प्रसन्न करने के विधान शास्त्रों में कहे गए हैं. गणेशजी प्रथम पूज्य हैं. उनके बिना कोई पूजा पूरी नहीं होती इसलिए हर हिंदू को गणेशजी से जु़डी सारी जानकारियां तो रखनी ही चाहिए. क्योंकि गणेशजी को प्रसन्न रखना बहुत जरूरी है.
इसके दो कारण हैं. पहला तो वह जगदंबा और शिव के पुत्र हैं. अर्थात गणेशजी प्रसन्न तो सारी सृष्टि प्रसन्न. सबकुछ सर्वसुलभ. दूसरा गणेशजी बालक रूप में हैं. बालक को प्रसन्न करने का यत्न कर लिया जाए तो वह सबकुछ दे सकता है. यदि अप्रसन्न हो जाए तो संभालना मुश्किल. इसलिए कहा जाता है कि गणेशजी को प्रसन्न रखिए और आनंद में रहिए.
गणेश चतुर्थी पर गणपति पूजा में की जाने अंग पूजन वाली भूल, आप न करेंः
गणेशजी की पूजा में एक विशेष विधान है भगवान के अंगों की पूजा. अक्सर लोग यही भूल करते हैं, वे गणपति के अंगों की पूजा नहीं करते जो गलत है. प्रथमपूज्य श्रीगणेश के विभिन्न अंगों के पूजन का महात्मय है. शीश के स्थान पर हाथी का मस्तक, एक दांत का टूटने से लेकर, लंबोदर और मूषक वाहन होने के पीछे संसार के कल्याण की गाथा है. अतः गणेश पूजा में उनके अंगों का स्मरण आवश्यक है. आइए जानते हैं उनके अंगों की पूजा का विशेष मंत्र.
गणेश चतुर्थी पर श्री गणेश जी के अंगों की विधिवत पूजाः
गणेश चतुर्थी पर गणपति के अंगों की पूजा इस प्रकार करें. हर मंत्र के साथ उनके उस अंग को धूप,दीप, आरती दिखाएं.
- ऊं गणेश्वराय नमः पादौ पूज्यामि। (पैर पूजन)
- ऊं विघ्नराजाय नमः जानूनि पूज्यामि। (घुटने पूजन)
- ऊं आखूवाहनाय नमः ऊरू पूज्यामि। (जंघा पूजन)
- ऊं हेराम्बाय नमः कटि पूज्यामि। (कमर पूजन)
- ऊं कामरीसूनवे नमः नाभिं पूज्यामि। (नाभि पूजन)
- ऊं लंबोदराय नमः उदरं पूज्यामि। (पेट पूजन)
- ऊं गौरीसुताय नमः स्तनौ पूज्यामि। (स्तन पूजन)
- ऊं गणनाथाय नमः हृदयं पूज्यामि। (हृदय पूजन)
- ऊं स्थूलकंठाय नमः कठं पूज्यामि। (कंठ पूजन)
- ऊं पाशहस्ताय नमः स्कन्धौ पूज्यामि। (कंधा पूजन)
- ऊं गजवक्त्राय नमः हस्तान् पूज्यामि। (हाथ पूजन)
- ऊं स्कंदाग्रजाय नमः वक्त्रं पूज्यामि। (गर्दन पूजन)
- ऊं विघ्नराजाय नमः ललाटं पूज्यामि। (ललाट पूजन)
- ऊं सर्वेश्वराय नमः शिरः पूज्यामि। (शीश पूजन)
- ऊं गणाधिपत्यै नमः सर्वांगे पूज्यामि। (सभी अंगों को धूप-दीप दिखा लें)
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