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शेर जीवित हो उठा. वह भूखा था. उसे अपने सामने चार शिकार आराम से खड़े हो दिखे. इससे अच्छा अवसर क्या होता. उसने सबको मारकर खा लिया.
यह कथा सुनाकर बेताल बोला- हे राजा, चारों ब्राह्मण अकाल ही मृत्यु के ग्रास बन गये. भूल उन्हीं की थी तो, किसी अन्य का कोई दोष नहीं. पर यह बताओ कि उन चारों में इस दुर्घटना का अपराधी कौन है?
राजा विक्रमादित्य ने कहा- जिसने शेर में प्राण डाले उसने ही सबसे बड़ा अपराध किया. उसके कारण ही सभी ब्राह्मण कुमारों के प्राण गए हैं. बेताल ने पूछा- ऐसा क्यों. सबका दोष बराबर का क्यों नहीं?
विक्रमादित्य ने कहा- जब उन्हें सड़ी गली हड्डियां दिखीं तो वे यह नहीं जानते थे कि ये किस जानवर के शेष हैं, क्योंकि वे ब्राह्मण कुमार थे, क्षत्रिय नहीं. इसलिए उन्होंने कभी शिकार नहीं किया होगा.
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