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राजा जनक के दरबार में एक बार ब्रह्मचर्चा चली. याज्ञवल्क्य जनक के राजपुरोहित थे. चर्चा वेद आधारित देवताओं की संख्या और कोटि पर पहुंची.
विदग्ध मुनि ने याज्ञवल्क्य से पूछा- हे ऋषिश्रेष्ठ वैदिक शास्त्र कहते हैं जो हमें देता है वह देवता है. तो फिर देवता कितने हैं? आप वेदों के आधार पर उनकी कोटि कैसे निर्धारित करेंगे?
विद्ग्ध ने आगे कहा- दिव्य शक्तियों से युक्त सभी जड़ और चेतन भी देव हैं. सूर्य, चंद्र, नक्षत्र से लेकर माता-पिता, गुरू आचार्य और अतिथि को भी देव कहा जाता है. देवों की संख्या के बारे में एक भ्रम हो रहा है. वेद आधारित निदान करें.
याज्ञवल्क्य ने उत्तर देना शुरू किया- हे विदग्ध! तैंतीस कोटि के जड़-चेतन ही देवता हैं. आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रूद्र, इंद्र एवं प्रजापति. वेद इन 33 प्रकार के देवताओं के बारे में कहते हैं.
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