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उन्होंने भगवान दत्तात्रेय पूरे कंठ से स्तुति की और फिर महागणपति को प्रसन्न करने का सरलतम मार्ग बताने को कहा.

दत्तात्रेयजी ने कहा- आप सब श्रीमहागणपति के एकाक्षरी मंत्र “गं” का जप करते हुए उनके वक्रतुण्ड स्वरूप की आराधना करें. आपके संकटों का समाधान अवश्य होगा.

भगवान दत्तात्रेय के परामर्श पर समस्त देवतागण भगवान श्रीगणेश के वक्रतुण्ड स्वरूप का ध्यान करते हुए एकाक्षरी मंत्र का जाप करने लगे. समस्त देवताओं की आराधना से संतुष्ट होकर भगवान् वक्रतुंड वहां प्रकट हुए. देवताओं के सारे संकट को उन्होंने सुना और निर्भय होने का वरदान दिया. भगवान वक्रतुंड ने कहा कि वह मत्सरासुर का अहंकार तोड़ेंगे.

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यह सुनकर देवता अत्यंत प्रसन्न हो गए. उनके अंदर की निराशा लुप्त हो गई. उत्साहित देवों ने कहा- हे भगवान श्री वक्रतुंड आपकी कृपा से हमारा कष्ट अब दूर होगा इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है. हे देव मत्सरासुर को पराजित करने के लिए होने वाले इस युद्ध में हमें भी शामिल करें. हम शिवजी की शक्तियों के सम्मुख विवश थे. असुरों को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि हम शक्तिहीन हो चुके हैं. हम आपकी अगुवाई में युद्ध के लिए प्रस्तुत हैं.

मत्सरासुर ने हमारे आयुधों और हमारी शक्तियों का घोर उपहास किया है. हे देव! आप सर्वसमर्थ हैं पर हमारी एक मनोकामना है. हे रणकौशल भगवान वक्रतुंड आप युद्ध के लिए जाते समय हमारे आयुधों और हमारी शक्तियों को भी धारणकर हमें गौरावन्वित करें. आपके साथ संयोग से हमारी शक्तियों पुनः स्थापित होंगी, इनका मान पुनः प्राप्त होगा.

वक्रतुंड आराधना मंत्र

भगवान वक्रतुंड ने देवताओं की बात रख ली. देवताओं ने उन्हें विभिन्न आयुध और अपनी शक्तियां भी प्रदान कर दीं.

भगवान् वक्रतुंड ने अपने गणों के साथ मत्सरासुर के नगरों पर आक्रमण कर दिया. पांच दिनों तक भयंकर युद्ध चला. इस युद्ध में मत्सरासुर के दोनों पुत्र सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय मारे गए.

इससे मत्सरासुर क्रोध में जल उठा. उसने युद्धभूमि में आकर भगवान् वक्रतुंड को बहुत अपशब्द कहे.

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