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इससे पहले कि ट्रिगर दबाकर गोली चला देता, महात्माजी शांतभाव से हंसते हुए बोल पड़े- यही भाव नरक है. क्रोध मे चूर होकर आपने अपना संतुलन खो दिया. कुछ समय पहले आप मेरे चरण छू रहे थे. आप यहां इस विश्वास से आए थे कि मैं आपकी सभी समस्याओं का व्यवहारिक निदान कर सकता हूं. किंतु चंद मिनटों में आपने अपनी सारी व्यवहारिकता भुला दी.

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आप मेरी हत्या को उतारू हो गए. क्रोध और आवेश में आप यह भी भूल गए कि मेरी हत्या के बाद आपको सजा हो जाएगी. फिर तो न सरकारी ओहदा रहेगा न ही वह पिस्तौल जिससे आप गोली चलाने वाले थे.

आप अपनी उपलब्धियां गिना रहे थे. फौज में रहते आपके पास अपनी उपलब्धियां बढ़ाने का अवसर है, पर हत्या करते ही सब पलभर में स्वाहा हो जाता. आपको फौज से अपमानित करके निकाला जाता. फिर कौन सी उपलब्धि और कौन सा बखान. अपने कर्मों से इंसान स्वर्ग से नरक के बीच की छलांग इतनी तेजी से लगा लेता है.

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फौजी ने शर्मिंदा होकर पिस्तौल वापस रख ली. उसकी आंखों में शर्म और पश्चाताप के भाव थे. कुछ पल शांत रहने के बाद महात्माजी ने बात आगे बढ़ाई.

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