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उसने मना कर दिया. प्रभु रोज शाम उसे दर्शन देते. वह अपने गांव लौट आया. पंडितजी कथा वांच रहे थे. उन्हें सारी बात बताई. यकीन न हुआ तो शाम को जब प्रभु दर्शन देने आए तो उनका एक आभूषण मांगकर दिखाया और साबित कर दिया.

पंडितजी बोले- भाई चोर असली साधू तो तू है. मैं तो कान्हा का नाम लेकर बस कथाएं सुनाता रहा और आजीविका जुटाता रहा लेकिन तुमने तो उन्हें ही जीत लिया.

यह कथा कल्पना की है लेकिन जितने भी भक्तशिरोमणि हुए हैं सबका जीवनवृत देख लीजिए. उन्हें हरिदर्शन तभी हुए जब उन्होंने हरि से मिलने की जिद ठान ली. हरि कभी नहीं कहते कि अपने कर्तव्यों को छोड़कर मुझे भजो.

वह कहते हैं अपने उद्देश्य पर दृढ़ रहो और मन से भक्ति करो. तुम्हारी नीयत पर पड़ी थोड़ी बहुत धूल तो मैं साफ कर ही दूंगा जैसा चोर का किया. यदि आपको कथा पसंद आई हो तो हमारे एप्प के साथ-साथ हमारे फेसबुक पेज से भी जुड़े, लाइक करें.

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प्रभु शरणम्

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