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फिर उन्होंने थैले में से पोथी खोली, देखने का स्वांग करते रहे. विचारकर बोले वृंदावन चले जाओ. मुझे जब मिले थे तो उन्होंने वृंदावन ही बताया था. चोर संतुष्ट हो गया और पंडितजी से आशीर्वाद लेकर विदा हुआ.

चोर रास्ता पूछता, भटकता वृंदावन पहुंचा. रास्ते में उसने बड़ी तकलीफें सहीं. जहां-जहां भी कन्हैया के मंदिर थे, उसमें दर्शन को गया. दर्शन क्या वह तो उनके आभूषणों को देखने जाता कि आखिर ऐसे आभूषण होंगे कन्हैया के पास.

आभूषण निहारने में उसने इतने मंदिरों में भगवान की इतनी छवि देख ली कि उसे खुली आंखों से भी प्रभु नजर आते. रात को मंदिरों में ठहर जाता और वहीं कुछ प्रसाद खा लेता.

माखनचोर भगवान आभूषण चोर पर रीझ गए. चोर के मन में प्रभु के आभूषणों के प्रति कामना ही भा गई. गोपाल उसे जगह-जगह दर्शन देते तरह-तरह के आभूषण से सजे बालकों के रूप में लेकिन वह उन्हें नहीं लेता. उसे तो असली गोपाल के आभूषण चाहिए थे.

चोर परेशान कि कब वह कन्हैया के धाम पहुंचे और कन्हैया परेशान कि वह इतनी दूर क्यों जा रहा है जब मैं राह में ही उसे सारे आभूषण दे रहा हूं. भगवान को भक्त से प्रेम हुआ तो भक्त के मन में बसा चोरी का भाव अनुराग में बदल गया.

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