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पार्वतीजी के क्रोध की तो अब सीमा ही न रही. अनुचर गोपनीयता को भंग करने लगे. वह पुष्पदंत को शाप देने के लिए तत्पर हुईं. इसे देखकर उसका मित्र माल्यवान बोल पड़ा- माता मूर्ख ने कौतूहलवश यह घृष्टता कर डाली है. यह इसका पहला अपराध है आप क्षमा करें.

पार्वतीजी का गुस्सा कम होने के बजाय और बढ़ गया. वह बोली- तू भी अपराधी का पक्ष ले रहा है. मैं तुम दोनों को शाप देती हूं कि मनुष्य योनि में चले जाओ और पृथ्वी पर जा गिरो.

पति को शाप मिलने की बात सुनकर जया दौड़ी हुई आई. पुष्पदंत और जया दोनों पार्वतीजी से दया की भीख मांगने लगी. पार्वतीजी का क्रोध शांत हुआ तो द्रवित हुई. उन्होंने कहा शाप समाप्त तो नहीं हो सकता, मुक्ति का उपाय बताती हूं.

पार्वती ने शापमुक्ति का उपाय बताते हुए कहा- एक यक्ष सुप्रतीक शापग्रस्त होकर कानभूति नाम से विन्ध्य के वन में पिशाच बन कर रहता है. पुष्पदंत, जब तुम उसे यही कथा सुना दोगे तो तुम्हारी शापमुक्ति हो जाएगी.

तुम्हारा यह साथी माल्यवान उस कानभूति से यह कथा सुनकर इसका प्रचार करेगा तब इसकी भी शापमुक्ति हो जाएगी. पुष्पदंत और माल्यवान धरती पर मनुष्य बन जा गिरे.
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