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वह समझ गए कि पुष्पों की चोरी कोई मानवीय शक्ति नहीं कर रही इसलिए उसे पकड़ने के लिए शिवशक्ति का प्रयोग ही करना होगा. राजा चित्ररथ भगवान शिव को अर्पित पुष्प एवं विल्वपत्र बाग में इस तरह बिछा दिए कि वे आसानी से दिखाई ही न पड़े.
पुष्पदंत प्रतिदिन की भांति उस दिन फिर से पुष्प चुराने के लिए आया. फूलों की सुगंध में मोहित पुष्पदंत को ध्यान ही नहीं रहा. उसने भूल से शिवजी के चढ़े विल्वपत्रों और पुष्पों को अपने पैरों से कुचल दिया.
पुष्पदंत ने जैसे ही फूलों पर पांव रखे उसकी दिव्य शक्तियां समाप्त हो गईं. पुष्पदंत स्वयं भी शिव भक्त था. उसे अपनी गलती का बोध हुआ. उसने शिवजी से क्षमा मांगते हुए उन्हें प्रसन्न करने के लिए एक परम स्तोत्र के रचना की.
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