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मेरा यह एक अस्त्र ही आपको सभी दैत्यों को मार गिराने में सक्षम बना देगा. यह कहते हुये भगावन शिवशंकर ने सभी आयुधों, अस्त्रों शस्त्रों के अभिभावक रूपी परशु (फरसा) उन्हें सौंप दिया.

परशु को धारण कर राम परशुराम हो गए. देवों ने उनकी स्तुति की. फिर परशुराम भगवान शम्भू को प्रणामकर सूर्य की किरणों के समान चमकदार दिव्य परशु को लेकर दैत्यों के साथ युद्ध को निकल पड़े. असुरों के साथ उनका भयानक युद्ध हुआ.

परशु के प्रहार से परशुराम ने असुरों का नाश कर दिया. उनके पराक्रम के आगे दैत्य नहीं ठहरे. जो जीवित बचे वे भाग गए. देवताओं को उनका देवलोक फिर से प्राप्त हो गया था. उन्होंने परशुराम की स्तुति की.

भगवान शिव के दिए काम को पूरा करने के बाद परशुराम ने शिवजी का ध्यान किया और उन्हें प्रणाम किया. मन में उनकी पूजन की प्रतिज्ञा और कंधे पर दिव्य परशु के धरे परशुराम बनने अपने आश्रम को लौट आए. पितामह भृगु का वचन भी पूरा हुआ था.

समस्त युद्धकौशल के ज्ञाता परशुराम ने फिर क्या किया. यह प्रसंग कल के पोस्ट में.
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