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हनुमानजी ने शनिदेव को कहा- आप कहीं अन्यत्र जाएं. ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी के मरणशील प्राणियों पर ही पड़ता है. जो दिन-रात हरिनाम का सुमिरन करता रहता हो उसके लिए क्या सतयुग क्या कलियुग. मेरे शरीर में श्रीरघुनाथजी के अतिरिक्त दूसरे किसी को स्थान मिल ही नहीं सकता.
लेकिन शनिदेव तो अपना प्रभाव साबित करने पर तुले थे.

शनि बोले- हनुमानजी मैं विधि के विधान से विवश हूं. आप पृथ्वी पर रहते हैं इसलिए आप मेरे प्रभाव क्षेत्र से बाहर नहीं हैं. आप पर मेरी साढ़े साती आज इसी समय से प्रभावी हो रही है. मैं आपके शरीर पर आ रहा हूं और इसे आप भी नहीं टाल सकते.

हनुमानजी ने फिर समझाया- यदि आपने मेरे शरीर पर आने का निश्चय ही कर लिया है तो आप आइए. मैं एक बार फिर कहूंगा कि यदि आप मुझ जैसे वृद्ध को छोड़ ही देते तो अच्छा होता. शनिदेव ने हनुमानजी की विनम्र वाणी का सही अर्थ नहीं समझा.

उन्होंने पलटकर कहा- कलियुग में पृथ्वी पर देवता या उपदेवता को नहीं रहना चाहिए. उनके लिए देवलोक बने हैं. जो पृथ्वी पर रहेगा वह कलियुग के प्रभाव में रहेगा. उसे मेरी पीड़ा भोगनी ही पड़ेगी. मैं मुख्य मारक ग्रह हूं. मृत्यु के सबसे निकट वृद्ध होते हैं, अतः मैं वृद्धों को कैसे छोड़ सकता हूं?’

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