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श्रीराम की बात सुनकर हनुमानजी प्रसन्न हो गए. वह उस स्थापित लिंग को उखाड़ने के लिए झपट पड़े. लिंग का स्पर्श करने से उन्हें बोध हुआ कि इसे उखाड़ना सामान्य कार्य नहीं है. बालू का लिंग वज्र बन गया था.
उसको उखाड़ने के लिए हनुमानजी ने अपनी सारी ताक़त लगा दी, किन्तु सारा परिश्रम व्यर्थ चला गया. अन्त में उन्होंने अपनी लम्बी पूँछ में उस लिंग को लपेट लिया और ज़ोर से खींचा.
शिवलंग टस से मस न हुआ. हनुमानजी उसे उखाड़ने के लिए ज़ोर लगाते रहे और अन्त में स्वयं धक्का खाकर तीन किलोमीटर दूर जाकर गिर पड़े तथा काफ़ी समय तक मूर्च्छित पड़े रहे.
घायल होने के कारण उसके शरीर से रक्त बहने लगा जिसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी सहित सभी उपस्थित लोग व्याकुल हो गए. सीता माता ने उनके शरीर पर हाथ फेरा तो मातृस्नेह रस से हनुमानजी की मूर्च्छा दूर हो गई.
हनुमानजी बड़ी ग्लानि हुई. वह श्रीरामजी के चरणों पर पड़ गए. उन्होंने भाव विह्वल होकर भगवान श्रीराम की स्तुति की. श्रीराम ने कहा-आपसे जो भूल हुई, उसके कारण ही इतना कष्ट मिला.
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Yeh pauranik kathaye padhkar muje ku6 na ku6 naya janne ko mil raha he aur muje umeed he age bhi aisi unsuni kathaye Prabhu Sharnam ke madhyam se janne ko milei……..
ravan k vad k piche kou bada eahasya h asa ku6 h agar isko vistar se samja sake to badi meherbani hogi