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शंकरजी ने कहा – हाँ, पर ठीक प्रकार से तो मुझे भी नहीं पता, विष्णुजी ही बता सकते हैं! व्यक्ति ने कहा – अच्छी बात है. आप भी चौथी जगह लग जाइए, और ले चलिए श्रीविष्णुजी के पास.
भोलेभंडारी भी पालकी में लग गए. अब चारों विष्णुजी के पास गए और पूछा कि एक बार ‘राधा-नाम’ लेने की क्या महिमा है. भगवान ने कहा- राधा नाम की यही महिमा है कि इसकी पालकी, आप जैसे देव उठा रहे हैं और अब यह मेरी गोद में बैठने का अधिकारी हो गए!
परम प्रिय श्री राधा-नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है- “जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’ अक्षर सुन लेता हू, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ.
’धा’ अक्षर का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्रीराधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूं!
जय श्री राधे-राधे!
यह भक्ति कथा बिजनौर से मानसी भटनागर ने भेजी है. आप भी ऐसी सुंदर कथाएं askprabhusharnam@gmail.com पर मेल कर सकते हैं. कथाएं अच्छे से लिखी हों और भक्तिमय या प्रेरणादायक हों. जो कथा प्रकाशित करने योग्य होगी हम उन्हें जरूर पोस्ट करेंगे.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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