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एक बार माता पार्वती ने शंकर भगवान से पूछा- एक तो आप मरघट में रहते हैं और उस पर भी खोपड़ी लिए घूमते रहते हैं. आप परमेश्वर हैं फिर भी ऐसे रूप में, ऐसी जगह, इस तरह क्यों रहते हैं?

भगवान शंकर ने उत्तर दिया था- जब प्रलय हुई और चारों और जल ही जल हो गया, सृष्टि का कुछ भी नहीं बचा तो मैंने उस जल में अपनी जांघ चीरकर एक बूंद खून टपका दिया.

इस खून से एक अंडा बन गया. अंडा जब फूटा तब उसमें से एक पुरुष निकला. उस अकेले पुरुष से मैंने प्रकृति का निर्माण किया. फिर कई प्रजापतियों का निर्माण किया और प्रजापतियों ने जंगल, जीव समूची सृष्टि की रचना कर दी.

सृष्टि का निर्माण कर प्रजापतियों को बड़ा घमंड हो गया. उनमें झगड़ा होने लगा कि श्रेष्ठ कौन है? उनकी आपसी लड़ाई से बहुत परेशान होकर मैंने सभी के शीश ही उतार लिए.

यह काम तो मैंने आसानी से कर दिया पर बाद में अपने किए पर दुःख हुआ कि उन्हें समझाना चाहिए था. इस तरह सिर काट देने वाली शायद अच्छी नहीं हुई. उसी भूल के पछतावे में मैं श्मशान में रहता हूं और हाथ में खोपड़ी पकड़े रहता हूं.
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