नवरात्रि जगदंबा की उपासना का सबसे उत्तम अवसर है. नवरात्रि पूजन का जितना धार्मिक आधार है, उतना ही वैज्ञानिक आधार भी है. नवरात्रि पूजा के धार्मिक और वैज्ञानिक, दोनों ही आधार जानकर गर्व होगा.

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साल में चार बार नवरात्रि होती है. चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि में गृहस्थजन और साधकजन दोनों ही विशेष पूजा करते हैं. पर दो नवरात्रियाँ ऐसी भी हैं जिन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. गुप्त नवरात्रि में तंत्र साधना से जुड़े लोग, तांत्रिक क्रियाएं करने वाले साधक विशेष साधनाएं करते हैं.
नवरात्रि साल में चार बार क्यों होती है? इसके पीछे खगोल विज्ञान बड़ा कारण है. नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार है. इसे जानकर आपको गर्व होगा. इसे समझने के लिए धैर्य की जरूरत है. पहले आपको नवरात्रि के बारे में बताते हैं.
चार नवरात्रि का अर्थ:
काल (समय) चक्र के विभाग अनुसार देखें तो पूरे एक दिन-रात में चार संधिकाल होते हैं. प्रात:काल, मध्यान्ह काल, सांयकाल और मध्यरात्रि काल कहा जाता है. हमारा एक वर्ष देवताओं और असुरों का एक दिन-रात होता है जिसे ज्योतिषशास्त्र में दिव्यकालीन अहोरात्र कहा गया है.
इस प्रकार पृथ्वीलोक के छह महीने में सुर-असुरों का एक दिन पूरा हुआ, छह महीने में एक रात. इसी को हम उत्तरायण और दक्षिणायन के नाम से जानते हैं.
‘अयन’ का अर्थ है- मार्ग. जब सूर्यदेव उत्तरी ध्रुव में विचरण करते हैं तब देवों का दिन काल होता है. इसे उत्तरायण कहते हैं. जब सूर्य दक्षिणी ध्रुव में विचरते हैं तब देवों की रात्रि होती है. इसे दक्षिणायन कहा जाता है. इसलिए सूर्य साल में छह महीने उत्तरायण और छह महीने दक्षिणायन होते हैं.
अब नवरात्रि की वैज्ञानिकता को ध्यान से समझिएगा. इसे समझकर विधर्मियों को विज्ञान आधारित उत्तर दे सकते हैं आप.
आपने कर्क वृत और मकर वृत के बारे में पढ़ा होगा. कहते हैं न सूर्य उत्तरायण हैं, दणिणायन हैं. उत्तरायण में शुभकार्य होंगे. वह है क्या? आपने भूगोल में कर्क रेखा और मकर रेखा के बारे में सुना होगा. पूरी पृथ्वी को दो हिस्सों में बांटा गया है- मकर वृत और कर्क वृत. सूर्य की दिशा परिवर्तन को इसी आधार पर मापा जाता है. उसी प्रकार मेष और तुला राशियों में सूर्य का गोल परिवर्तन मापा जाता है.
जब सूर्य मेष राशि में होते हैं तो उत्तरी गोल में उनकी स्थिति मानी जाती है. जब तुला राशि में विचरण करते हैं तब से दक्षिण गोल में स्थिति मानी जाती है. इस प्रकार चार प्रकार के परिवर्तन सूर्य में हर साल हुए. दो मार्ग परिवर्तन, दो गोल परिवर्तन.
इसे और सरलता से समझाता हूं. आप अपने घर के फर्श पर एक लकीर खींच दें. लकीर के दोनों ओर एक-एक गेंद रख दें. एक तरफ लाल एक तरफ पीला. आपने सोचा अब दोनों की अदला-बदली कर देते हैं. आप गेंद उठाएंगे और उसे लेकर चलेंगे. बीच में आप विभाजन रेखा से होकर तो गुजरेंगे ही. बिना उसे पार किए तो साइड चेंज नहीं किया जा सकता न. जहां पर दोनों गेंद विभाजन रेखा पर मिलें उसे आप मीटिंग या संधि प्वाइंट कह लें.
ठीक इसी तरह सूर्य के साथ होता है. दो बार मार्ग बदलते हैं, तो बार गोल बदलते हैं. यानी अयन या मार्ग संधियां होंगी और दो गोल परिवर्तन की संधियां. इस तरह कुल मिलाकर वर्ष में चार संधियां होती हैं. इनको ही नवरात्रि के पर्व के रूप में मनाया जाता है. चार नवरात्रियां हो गईं. और विस्तार से समझते हैं.
हम मानवों के दिन में भी चार काल होते हैं उसी तरह देव-असुरों के चार काल हुए. इसीलिए चार नवरात्रि को इस प्रकार नाम दिया जाता है-
1. प्रात:काल या MORNING (गोल संधि) चैत्र नवरात्र
2. मध्यान्ह काल या NOON (अयन संधि) आषाढी नवरात्र
3. सांयकाल या EVENING (गोल संधि) आश्विन नवरात्र
4. मध्यरात्रि या MID NIGHT (अयन संधि) माघी नवरात्र
इन चार नवरात्रियों में गोल संधि की नवरात्रियाँ चैत्र और आश्विन मास की हैं. ये दिव्य अहोरात्र यानी देवताओं के दिन के समय (MORNING & EVENING) की संधि में आती हैं. गृहस्थ इऩ्हें ही विशेष रूप से मनाते हैं.
देवों के प्रातःकाल और संध्याकाल के अवसर पर माता का विशेष अनुष्ठान गृहस्थों को अवश्य करना चाहिए. इसमें हम जगदंबा को दुर्गा नाम से विशेषकर पूजते हैं. आपने श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ किया होगा. वहां आपने अवश्य पढ़ा होगा मां के प्रादुर्भाव का प्रसंग.
माता समस्त देवताओं की संयुक्त शक्तियों को धारण करती हैं. अर्थात माता दुर्गा की उपासना से समस्त देवों की पूजा हो गई. इसलिए प्रातःकाल और संध्याकाल में मां दुर्गा की पूजा करने से एक साथ सभी देवों की पूजा हो जाती है. देवों का प्रातःकाल और संध्याकाल हम मनुष्यों के लिए चैत्र और आश्विन नवरात्र में हुआ.
अब आपको स्पष्ट हो गया होगा कि गृहस्थों को इन दो नवरात्रों में ही पूजा के लिए विशेष रूप से क्यों कहा जाता है. कैसे नवरात्रि पूजन से एक साथ सभी देवों की पूजा हो जाती है.
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गुप्त नवरात्रि क्या है. गुप्त नवरात्रि क्यों साधकों के लिए ही है? अगले पेज पर जाने यह रहस्य…
गुप्त नवरात्रों का रहस्यः
अयन के संधि की नवरात्रि यानी (आषाढ़ और माघ) मास की नवरात्रियां देवताओं के लिए दोपहर और रात्रिकाल हुईं. दोपहर और रात्रिकाल विश्राम का समय होता है.
अपने ऊपर इस उदाहरण को समझें. मान लीजिए कि आपको दोपहर में भी एक घंटे की नींद लेने की आदत है पर किसी को आपकी सहायता की आवश्यकता है. वह आपको पुकार रहा है.
चेतन अवस्था में तो आप सरलता से उसकी पुकार सुन लेंगे किंतु निद्रा अवस्था में आपको जगाने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे. कई बार आवाज लगानी हो सकती है. सहायता मांगने वाले को बताना होगा कि इमरजेंसी थी इसलिए आपको कष्ट दिया.
अपनी पीड़ा को बताकर आपको द्रवित करना होता है तभी आप तत्काल सहायता के लिए जाएंगे अन्यथा आप कह सकते हैं कि बाद में आना. इसी कारण गुप्त नवरात्रि में कठोर अनुष्ठान होते हैं. विशेष कार्यों के लिए माता को समस्त शक्तियों के साथ पुकारना होता है. इसमें बस साधक ही सक्षम हैं.
गुप्त नवरात्रि में दसमहाविद्या देवियों की पूजा विशेष रूप से की जाती है. त्वरित सहायता तो वही दे सकता है जो त्वरित एक्शन के लिए बना हो, त्वरित कार्य में ही विश्वास रखता हो. दसमहाविद्या देवियां जगदंबा ने रैपिड एक्शन के लिए ही तो प्रकट की थीं. उसकी कथा भी संक्षेप में जान लीजिए.
शंकरजी से माता सती ने अपने पिता के यहां जाने की अनुमति मांगी. शंकरजी ने कहा कि बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए. माता को जाना ही था. उन्होंने शंकरजी को प्रभावित करने के लिए अपनी दसमहाविद्या शक्तियों को प्रकट किया.
दसों देवियों के एकसाथ प्रकट हो जाने से भगवान शंकर कुछ विचलित हुए. उनके विचलित होने का अर्थ था संपूर्ण जीव-जगत में हडकंप.
उन्होंने माता से कहा- आप अपने आवेश रूप को तत्काल समेट लें और सौम्य स्वरूप में आएं. देवी मैंने आपसे तत्काल अपनी शक्तियों को समेटने के लिए इसलिए कहा क्योंकि मैं तो आपकी इस शक्ति से अप्रभावित रहूंगा परंतु इससे जगत विचलित हो रहा था.
आप अपने पिता के यहां अवश्य जाएं परंतु स्मरण रहे अनुचित दबाव बनाकर मनवाई गई बात अनिष्टकारी ही होती है. और ऐसा ही हुआ सतीजी को योगाग्नि में स्वयं को भस्म करना पड़ा था.
तान्त्रिक कार्यों के लिए साधक दसमहाविद्या देवियों में से अपनी आराध्या को विशेष क्रियाओं से प्रसन्न कर उनसे शक्तियां प्राप्त करते हैं. गृ्हस्थों के लिए गोल संधिगत नवरात्रियों का वैसा विशेष महत्व नहीं है.
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नवरात्रि पूजन से कैसे हो जाता है एक साथ सभी देवताओं का पूजन. नवरात्रि क्यों, नवदिवस क्यों नहीं? पढ़ें अगले पेज पर…
क्यों नवरात्रि काल में विशेष पूजा-अनुष्ठान की आवश्यकता है.
जिन चान्द्रमासों में नवरात्रि पर्व का विधान है वे क्रमश: चित्रा, पूर्वाषाढा, अश्विनी और पुष्य नक्षत्रों पर आधारित हैं. अयन, गोल तथा ऋतुओं के परिवर्तन मानव मस्तिष्क को आंदोलित करते हैं. मानव का मस्तिष्क अनन्त शक्ति स्त्रोतों का अक्षय भंडार है.
उसमें जहां संसार के निर्माण करने शक्ति है, वहीं संहार करने की शक्ति भी केन्द्रित है. इसीलिए तीन गुणों वाली आदि मातृशक्तियां महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी हमारी आराध्या रही हैं. विज्ञान भी कहता है कि सृजन की सर्वाधिक क्षमता स्त्री कारक में है. जो सृजन करता है वही सर्वाधिक धारण करने की क्षमता रखता है.
ऋतु परिवर्तन काल में इन देवियों का विशेष अनुष्ठान करके हम अपने अंदर की सकारात्मक शक्तियों को जागृत करते हैं. व्रत और विशेष अनुष्ठान इसलिए किए जाते हैं ताकि शरीर तपकर, सात्विक होकर उन शक्तियों के अंश को अपने अंदर समाहित करने में समर्थवान बन सके.
इसे नवरात्रि क्यों कहते हैं, नवदिवस क्यों नहीं?
भगवान शिव अर्धनारीश्वर भी कहे गए हैं. यह पर्व रात्रि प्रधान इसलिए कहा गया है क्योंकि शास्त्रों में “रात्रि रूपा यतोदेवी दिवा रूपो महेश्वर:” अर्थात दिन को भगवान शिव (पुरूष) रूप में तथा रात्रि को शक्ति (प्रकृति) रूप में स्थित होते हैं.
एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं, फिर भी शिव (पुरूष) का अस्तित्व उनकी शक्ति (प्रकृति) पर ही आधारित है. पुरुष और प्रकृति के संतुलन से ही सृष्टि का अस्तित्व है. इसलिए प्रकृति की उपासना को वरीयता देने के लिए इसे नवरात्रि माना गया है.
समझने की आवश्यकता है और गर्व करने की बात है कि अखिल पिण्ड ब्रह्मांड के समस्त संकेतों के पारखी ऋषि-मुनियों नें नैसर्गिक सुअवसरों को परख कर हमें विशेष रूप से संस्कारित बनाने का प्रयास किया है.
दैहिक, दैविक और भौतिक ताप जिसे त्रिविध ताप कहा जाता है उसके नाश की मनुष्य को वर्ष के कुछ विशेष अवसरों पर बड़ी आवश्कता होती है. हमारे ऋषियों ने ऐसे अवसरों की उत्तम गणना की और हमें विधि-विधानों से बांधा.
नवरात्रि के व्रत आदि विज्ञानपोषित हैं. किसी भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन्हें परखकर देख लीजिए ये उत्तम सिद्ध होंगे.
इस पावन पर्व की गरिमा को समझते हुए हमें दिव्यशक्ति की आराधना, उपासना करते हुए पूर्ण मर्यादासहित, मन को विषय भोगों से दूर रखकर नवरात्रि पूजन करना आवश्यक है.
नवरात्रि पर्व की धार्मिक और वैज्ञानिक महत्ता समझने में आपको कुछ सुविधा हुई होगी ऐसा विश्वास है. प्रभु शरणम् का उद्देश्य ही यही है, धर्म के मर्म को समझाना, उसका प्रचार करना.
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