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कुंभ की दो कथाओं में से एक का नाता गरूड़ का अपनी माता को दासता से मुक्त कराने से जुड़ा है. अपनी माता को दासता से मुक्त करने के लिए अमृत लाने की शर्त रखी गई थी. अमृत कलश लेने के लिए गरूड़ को देवताओं से युद्ध करना पड़ा.
इंद्र के वज्र प्रहार से गरूड़ डगमगाए और कलश से अमृत छलककर पृथ्वी पर चार जगह गिरा. वहां कुंभ आय़ोजन होता है. कथा संक्षेप में सुनाने में कुछ छूट न जाए, अतः विवाद व उसकी पृष्ठभूमि की कथा भी सुना देते हैं. शुरूआत गरूड़ की जन्मकथा से.
दक्ष प्रजापति ने अपनी कई बेटियां कश्यप ऋषि से ब्याहीं थीं. बाद में अपनी दो अन्य बेटियों, कद्रू और विनता का विवाह भी कश्यप से ही कर दिया. कद्रू और विनता दोनों का आपस में अगाध प्रेम था.
एक शाम कश्यप ने दोनों से प्रसन्न होकर कहा- मैं तुम दोनों की सेवा से संतुष्ट हूं. कोई मनचाहा वर मांग लो. कद्रू ने मांगा- मैं एक हजार तेजस्वी नागों की माता बनूं.
कश्यप ने विनीता से पूछा तो वह बोलीं- स्वामी, मुझे तो भले ही बस दो ही संतानें हों पर वे शरीर, बल और विक्रम में कद्रू के समस्त पुत्रों से बढ-चढ कर हों. कश्यप ने वरदान दे दिया.
दोनों कश्यप के वरदान के फलीभूत होने की प्रतीक्षा अधीरता से करने लगीं. सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू ने हजार अंडे जन्म दिए जिसमें से तत्काल हजार चपल चमचमाते विषधर नाग निकले.
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