January 28, 2026

मन की दासता यानी बुद्धि-विवेक का अंतः भागवत में पढ़ें पुरंजन की कथा- पहला भाग

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ध्रुव के वंशज और राजा पृथु के पोते बर्हिषत एक के बाद एक यज्ञ करते जा रहे थे लेकिन संसार से मोह नहीं छूट रहा था. तब नारदजी ने उनकी आंखें खोलने के लिए पुरंजन की कथा सुनाई.

एक राजा थे- पुरञ्जन. पुरंजन के मित्र थे अविज्ञाता. अविज्ञाता का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि कोई न तो उनका परिचय जानता था न ही उनकी बातें समझ पाता था.

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पुरंजन और अविज्ञाता हमेशा साथ रहते थे. पुरंजन का मन अपने राजमहल से उचट गया था. वह अपने रहने के लिए कोई बेहतर स्थान की खोज करने निकले.

अविज्ञाता ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पुरंजन नए स्थान की खोज के लिए भटकते रहे और हिमालय की तराई में पहुंच गए.

हिमालय के पास उन्हें एक बहुत सुंदर नगर दिखा. सुगंधित फूलों से भरे सुंदर बाग-बगीचों वाले नगर के नौ द्वार थे. पुरंजन उस नगर की सुंदरता को निहारता रहा.

नगर विरान नजर आता था. तभी पुरंजन को एक अद्वितीय सुंदरी दिखाई पड़ी. पांच फनों वाला नाग उसकी रक्षा कर रहा था. सुंदरी के साथ दस मुख्य सेवक भी थे.

पुरञ्जन उस सुंदरी को निहारता रहा. युवती ने भी पुरंजन को देखा और मोहित हो गई. पुरंजन ने पूछा- आप कौन हैं देवी? ब्रह्मांड में आप जैसी सुंदरी मैंने कभी नहीं देखा. अपना परिचय दें.

सुंदरी ने कहा- मुझे अपने माता-पिता या गोत्र का कोई ज्ञान नहीं है. मैं बस इतना जानती हूं कि मैं इस नगर की स्वामिनी हूं और ये मेरे सेवक. मैं अपने लिए योग्य वर तलाश रही हूं.

युवती ने कहा- मैं आपके मन की बात जानती हूं. आप मेरे साथ विवाह करके इस नगर में निवास करें. संसार के सभी सुखों को भोगते हुए विलासपूर्ण जीवन बिताएं.

पुरंजन को तो मन की मुराद मिल गई. दोनों ने विवाह कर लिया. सुंदरी के प्रेम में डूबे हुए पुरंजन ऐश्वर्य के साथ गृहस्थ जीवन जीने लगे.

पुरंजन कई संतानों के पिता बने. उनकी पत्नी और सभी संतानें उनसे बहुत प्रेम करते थे. पुरंजन भी पत्नी की हर बात मानते. वह दिन कहे तो दिन, रात कहें तो रात.

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एक बार पुरंजन पांच हवा सी गति से चलने वाले घोड़ों से बने रथ पर सवार होकर शिकार के लिए गया. शिकार में खोया वह कई दिनों तक वन में भटकता रहा और अनगिनत जीव मार डाले.

कई दिनों तक उसने कुछ खाया पीया भी नहीं, बस शिकार करता रहा. इस दौरान उसे न तो अपनी रानी की याद आई न सुंदर नगर की. जब भूख महसूस हुई तो नगर लौटा.

राजा लौटा तो उसकी रानी रूठी बैठी थी. उसने रानी को किसी तरह मना लिया और उसके साथ अनंतकाल तक रास में डूबा रहा. उसने अनेक और संतानें पैदा कीं.

इसके बाद वह पहले पुत्र-पुत्रियों, फिर पौत्रों और पौत्रियों उसके बाद उनकी संतानों के विवाह आदि काम में ही फंसा रहा और समय का पता ही न चला.

गंधर्वराज चंडवेग की उसके नगर पर नजर थी. उसने सेना लेकर आक्रमण किया और नगर को लूटने लगा.

इधर काल की पुत्री जरा अपने लिए एक पुरुष की तलाश में घूम रही थी. जरा कुरूप थी. उससे कोई विवाह नहीं करना चाहता था. राजा पुरू ने अपने पिता ययाति को यौवन देने के लिए उसका एक बार वरण किया था. जब पुरू ने जरा को त्याग दिया तब वह नारद पर मोहित हुई.

जरा ने नारद से प्रेमदान मांगा लेकिन नारद ने अपने ब्रह्मचर्य व्रत का हवाला देकर उसकी मांग ठुकरा दी. उसने नारद को शाप दिया तुम कहीं टिक नहीं सकोगे.

जरा ने अपनी कामेच्छा की पूर्ति के लिए कैसे अपने दो भाइयों भय प्रज्वर की सहायता से इच्छित पुरुषों को बल से प्राप्त करना शुरू किया और पुरंजन की क्या गति की.

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पुरंजन की कथा का अगला भाग आज दोपहर की पोस्ट में पढ़ें. कथा बड़ी होने के कारण हमने इसे दो हिस्सों में बांट दिया ताकि आपको बोझिल न लगे.

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