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संत ने उसे गले लगा लिया. फिर अन्य शिष्यों को समझाते हुए कहा- तुम तीनों के कार्य करने के ढंग में अंतर था. मंदिर तो तुम तीनों ही बना रहे थे. एक गधे की तरह कार्य कर रहा था, दूसरा स्वयं के कल्याण के लिए और तीसरा समर्पित भाव से कार्य कर रहा था.

भावों का यही अंतर तुम्हारे कार्य की गुणवत्ता में भी देखा जा सकता है. क्या किया जा रहा है वह तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कार्य के पीछे का भाव. जैसी भावना रहती है, फल उसके अनुरूप ही आता है.

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