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संतजी ने दूसरे शिष्य से भी यही प्रश्न पूछा तो वह बोला- गुरुदेव! मैं भी सारा दिन कार्य करता था. मंदिर के निर्माण कार्य के दौरान मेरे मन में तो यही विचार आ रहा था कि जल्द-से-जल्द मंदिर बन जाए, जिससे ईश्वर प्रसन्न हो जाएं और हमारा कुछ कल्याण हो जाए.

संत ने तीसरे शिष्य को बुलाकार भी पूछा तो उसने भाव भरे हृदय से उत्तर दिया- गुरुदेव! मैं तो प्रभु की सेवा कर रहा था. मंदिर के निर्माण कार्य के दौरान मैं प्रतिदिन प्रभु का धन्यवाद करता था क्योंकि उन्होंने मेरी मेहनत का कुछ अंश स्वीकार किया. मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानता हूं.

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