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सुदेहा शव को तालाब में फेंककर आ गई और आराम से घर में सो गई. प्रतिदिन की भांति घुश्मा अपने पूजा कृत्य में लग गई और सुधर्मा भी अपने नित्यकर्म में लग गए.

सुदेहा भी जब सुबह उठी तो उसके हृदय में जलने वाली ईर्ष्या की आग अब बुझ चुकी थी इसलिए वह भी आनन्दपूर्वक घर के काम-काज में जुट गई. जब बहू की नींद खुली तो उसे खून दिखाई पड़ा.

यह दृश्य देखकर बहू विलाप करने लगी. अपनी वधू को रोता देखकर भी घुश्मा विचलित नहीं हुई. वह पार्थिव शिवपूजन व्रत में लगी रही. उसने पुत्र की रक्षा का दायित्व महादेव को सौंप दिया.

उसने बहू को कहा कि चिंता मत करो तुम्हारे पति की रक्षा कालों के भी काल महाकाल के हवाले मैंने कर रखा है. वे ही सर्वेश्वर प्रभु हमारे संरक्षक हैं. वह पंचाक्षर मंत्र ऊं नम: शिवाय का उच्चारण करती पार्थिव लिंगों को लेकर सरोवर के तट पर गई.

जब पार्थिव लिंगों को तालाब में डालकर वह वापस लौटने लगी तो उसका अपना पुत्र उस सरोवर के किनारे खड़ा हुआ दिखाई पड़ा. वह माता के साथ घर की ओर चल पड़ा.

तभी भगवान भोलेनाथ वहां प्रकट हुए और घुश्मा से बोले- मैं तुमपर प्रसन्न हूं. इसलिए तुम वर मांगो. तुम्हारी सौत ने तुम्हारे पुत्र को मार डाला था. अत: मैं भी उसे त्रिशूल से मारकर उसे दंड दूंगा.

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