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लाचार विनता ने कद्रू को और गरुड़जी ने माता की आज्ञा से सभी सर्पों को अपने कंधे पर बैठा लिया और कद्रू के बताए स्थान की ओर चल पड़े. गरुड़ हजार नागों को पीठ पर बिठाए बहुत ऊँचाई पर उड़ रहे थे.
सूर्य की भीषण गर्मी से सर्प बेहोश हो गये. कद्रू ने इन्द्र की विनती की तो बादल छा गए, वर्षा हुई, सभी सर्प चेतना में लौटे. सर्पों का दर्शनीय स्थल वास्तव में मनोहारी था. लवणसागर, वन आदि में सर्पं ने खूब विहार किया, आनंद उठाया.
चलने को हुए तो सर्प गरुड़ से बोले- तुमने तो आकाश में उड़ते समय बहुत से दर्शनीय द्वीप देखे होंगे. अब हमें और किसी द्वीप में पर्यटन हेतु ले कर चलो. गरुड़ चिंता में पड़ गये.
उन्होंने सोचा कि इस प्रकार हजार सर्प हजार प्रकार की इच्छाए, अकेला किसकी किसकी पूर्ति करूंगा. गरूड़ ने अपनी माता से पूछा कि सर्पों की आज्ञा का पालन करना क्या कोई उनकी विवशता है या वह उन को मना भी कर सकते हैं.
विनता ने बताया- बहन ने मुझसे छल लिया और दासी बना लिया. इसके लिए मेरे अपने ही पुत्र का शाप भी कारण है. अब उनके आदेश का पालन करके उनकी सेवा हमारी विवशता है और धर्म भी.
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Aap ka yeh prayaas zaroor logon me ek achcha parivartan layega ,aur logon me dharm, aadhyatmik jaisi katha prasang se kuch na kuch jaanane milega, aur agar kisi aise insaan ne aadhyatmik ka marg apna liya ki jo aisi katha ya purano me yakeen nahi karta to samaj lijiyega ki aapka ye prayas safal ho gaya.
Meri taraf se aapki poori team ko bahot bada dhanyavaad hai , ki aap log is internet ke yug me bhi aise kaam kar rahe hai…….