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अभी नासिक में पवित्र कुंभ का आयोजन हुआ है. कुंभ से जुड़ी कथा सुनाने का जो हमने आपको वचन दिया था उसी शृंखला में हमने गरूड़ की कथा सुनानी शुरू की है. आशा है सावन में शिव कथाओं का आनंद Mahadev Shiv Shambhu एप्प में ले रहे होंगे.
पिछली कथा में आपने पढ़ा कि दक्ष प्रजापति के दो बेटियां कद्रू और विनता जो ऋषि कश्यप को ब्याही थीं, उनमें से कद्रू के गर्भ से निकले अंडे से में से हजार शक्तिशाली नागों का जन्म हुआ.
विनता के गर्भ से दो अंडे निकले. उसने अपनी अधीरता के कारण अंडे को समयपूर्व फोड़ दिया. उससे अरूण पैदा हुए जिनका मात्र आधा शरीर ही पुष्ट था. कुपित अरूण ने माता को 500 वर्ष के दासत्व का शाप दिया और सूर्य की सेवा में सारथी बन गए.
कद्रू ने धूर्तता से अपने नाग पुत्रों की सहायता से विनता को शर्त में हराकर अपनी दासी बनने पर विवश कर दिया. विनता को दासीत्व और श्राप से कोई मुक्ति दिला सकता था तो 500 वर्षों बाद पैदा होने वाला पुत्र.
विनता पुत्र के वियोग और दासत्व दोनों के कारण दुखी रहती थीं. विनता को बाद में कद्रू के पुत्रों ने ही उस छल के बारे में बता दिया जिससे कद्रू ने उसे दासी बनाया था. उसे अपने दूसरे पुत्र की प्रतीक्षा थी जो दासता से मुक्त करा सकता था.
समय पूरा होने पर विनता के अंडे से एक महातेजस्वी पक्षी निकला. उसके तेज से दिशाएं प्रकाशित हो उठीं. उसकी शक्ति,गति,चमक और बुद्धि विलक्षण थी.
उसके नेत्र बिजली के समान चमकीले थे और शरीर अग्नि के समान तेजस्वी. जन्मते ही वह शिशु आकाश में बहुत उडा.
देवताओं ने समझा अग्निदेव ने नया रूप धरा है. सब को भयभीत देखकर अग्नि ने कहा कि यह मैं नहीं परम तेजस्वी गरुड़ हैं. ये नागों के नाशक, देवताओं के हितैषी और असुरों के शत्रु हैं.
एक दिन विनता अपने पुत्र के पास बैठी हुई थी. कद्रू ने उसे बुलाकर आदेश देते हुये कहा- मुझे समुद्र के अन्दर नागों का दर्शनीय स्थान देखना है. तू मुझे ले चल.
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