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हरिपदपाद्यतरंगिणी गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे।दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ 3 ॥
(हे देवी! आपका जल श्री हरि के चरणामृत के समान है। आपकी तरंगें बर्फ, चंद्रमा और मोतियों के समान धवल हैं। कृपया मेरे सभी पापों को नष्ट कीजिए और इस संसार सागर के पार होने में मेरी सहायता कीजिए।)
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।मातर्गंग त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ 4 ॥
(हे माता! आपका दिव्य जल जो भी ग्रहण करता है, वह परम पद पाता है। हे मां गंगे! यमराज भी आपके भक्तों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।)
पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खंडित गिरिवरमंडित भंगे।भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये ! पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये ॥ 5 ॥
(हे जाह्नवी गंगे! गिरिवर हिमालय को खंडित कर निकलता हुआ आपका जल आपके सौंदर्य को और भी बढ़ा देता है। आप भीष्म की माता और ऋषि जह्नु की पुत्री हो। आप पतितों का उद्धार करने वाली हो। तीनों लोकों में आप धन्य हो।)
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके।पारावारविहारिणिगंगे विमुखयुवति कृततरलापंगे॥ 6 ॥
(हे मां! आप अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हो। आपको प्रणाम करने वालों को शोक नहीं करना पड़ता। हे गंगे! आप सागर से मिलने के लिए उसी प्रकार उतावली हो, जिस प्रकार एक युवती अपने प्रियतम से मिलने के लिए होती है।)
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