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उधर कौरव पक्ष में भी चर्चा हो रही थी कि कौन-कौन महाबली, किस-किसके सहयोग से और कितने दिनों में महाभारत का युद्ध जीत सकता है. भीष्म पितामह और कृपाचार्य यह युद्ध एक-एक महीने में, द्रोणाचार्य 15 दिनों में, अश्वत्थामा 10 दिनों में जबकि कर्ण इसे मात्र छह दिनों में ही जीत सकते थे.

पांडव खेमे में अर्जुन ने कहा कि वह अकेले मात्र एक दिन में ही यह युद्ध जीत सकते हैं. अर्जुन की बात सुनकर बर्बरीक चर्चा के बीच में ही बोल पड़े- मेरे होते आप लोगों को यह युद्ध लड़ने की आवश्यकता नहीं होगी, मैं अकेला अपने अजेय आयुधों के साथ इस युद्ध को एक पल में जीत लूंगा. आपको विश्वास न हो तो मेरे पराक्रम की परीक्षा ले लें”

यह सुनकर अर्जुन बड़े लज्जित हुए और श्रीकृष्ण की और देखने लगे. इस पर श्रीकृष्ण ने कहा-यह नव आगंतुक ठीक ही तो कह रहा है. पूर्वजन्म में इसने पाताल लोक में नौ करोड़ पलाशी दैत्यों का संहार कर दिया था. श्रीकृष्ण ने उसके पराक्रम को परखना चाहा.

उन्होंने पूछा-‘वत्स! भीष्म, द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा और दुर्योधन आदि महारथियों द्वारा सुरक्षित कौरव सेना पर भगवान शंकर द्वारा ही विजय पाना संभव है. तुम इसे कैसे पलभर में जीत सकते हो?’

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