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उन्होने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो पता चला कि सभी बछड़ों तथा बाल-ग्वालों में तो स्वयं कृष्ण विराजमान हैं. यह देखकर ब्रह्माजी चकित रह गए. उन्हें अपने कार्य के लिए थोड़ी ग्लानि भी हुई.

ब्रह्माजी श्रीकृष्ण के पास गए और उनकी स्तुति करने लगे. तब भगवान श्रीकृष्ण ने भी उन्हें अभिवादन पूर्वक सम्मान दिया. ब्रह्माजी ने बछड़ों तथा बाल-ग्वालों को तुरंत वापस सौंप दिया. गोकुलवासियों को उनकी संतानें और गोधन प्राप्त हो गए थे.

प्रभु की माया से किसी को तनिक भी आभास नहीं हुआ. वास्तव में जब श्रीकृष्ण का अन्नप्राशन संस्कार हो रहा था तो सभी गोकुल के लोगों और गायों के मन में स्नेह उमड़ा. सब श्रीकृष्ण को पुत्र रूप में स्नेह देने की कामना करने लगे.

साक्षात ईश्वर के सामने कोई प्रार्थना हो तो वह उसकी अनदेखी कैसे कर सकते हैं. उन्होंने सबकी प्रार्थना स्वीकार की. इस तरह उन्होंने करीब एक वर्ष तक सबकी संतान के रूप में समय बिताया और उनकी अभिलाषा भी पूरी कर दी.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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