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देवों के गुरु बृहस्पति और शुक्राचार्य में पुराना बैर था. शुक्राचार्य से यह विद्या सीखनी भी जरूरी थी इसलिए बृहस्पति ने अपने बेटे कच को कहा कि वह भक्ति तथा सेवा से शुक्राचार्य को प्रसन्नकर संजीवन-मंत्र सीख ले.

कच अद्भुत सुंदर और ब्रह्मचारी था. शुक्राचार्य ने उसे शत्रुपुत्र समझकर बहुत दुत्कारा पर वह गुरुभक्ति पर अडिग रहा. शुक्राचार्य द्रवित हो गए. उसे अपना शिष्य बना लिया और अपने आश्रम में रहने की अनुमित दे दी.

शुक्राचार्य की एख रूपवती पुत्री थी देवयानी. देवयानी कच की सुंदरता पर रीझ गई और उससे प्रेम करने लगी. कच इस प्रेम से अंजान था.

असुरों को जब भनक लगी कि देवताओं के गुरु का पुत्र असुरों के आचार्य के पास अध्ययन के लिए आया है तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं शुक्राचार्य वह विद्या कच को न बता दें जिसके बल पर असुर विजयी होते हैं.

असुरों ने कच के वध का फैसला किया. पर वे आचार्य से डरते थे, इसलिए उन्होंने गोपनीय रूप से कच की हत्य करने की सोची. आखिरकार असुरों ने एक दिन कच को मार भी डाला.

देवयानी को कच की हत्या का पता चल गया. उसने पिता से जिद किया कि मृत संजीवनी विद्या का प्रयोग करके वह कच को पुनः जीवित कर दें. शुक्राचार्य ने देवयानी की बात मान ली.

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